दीपावली दीपों का त्योहार, आतिशबाजी से करे इंकार

देवेन्द्रराज सुथार

देवेन्द्रराज सुथार

देश का सबसे घनी आबादी वाला शहर दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में लगातार दूसरे साल भी दिवाली के मौके पर सुप्रीम कोर्ट ने पटाखों पर प्रतिबंध बरकरार रखा है। सर्वोच्च न्यायालय का यह फैसला स्वागत योग्य है। क्योकि पटाखों से फैले हुए वायु प्रदूषण का प्रभाव दिल्ली की जनता पहले भी झेल चुकी है। मेरा मानना है कि यह फैसला एकांगी भी है। इस फैसले को सम्पूर्ण भारत मे लागू किया जाना चाहिए। ताकि देश प्रदूषण एवं श्वास विकार की समस्या से बच सके। यह फैसला दिवाली पर ही क्यों बाकी त्योहार, क्रिसमस, नये साल पर, खुशी के मौके पर, इत्यादि अवसरों पर आतिशबाजी पर प्रतिबंध लगाना चाहिए।

हम जानते है कि हर साल दीपावली पर करोड़ों रुपयों के पटाखों का उपयोग होता है। यह सिलसिला कई दिन तक चलता है। कुछ लोग इसे फिजूलखर्ची मानते हैं, तो कुछ उसे परंपरा से जोड़कर देखते हैं। पटाखों से बसाहटों, व्यावसायिक, औद्योगिक और ग्रामीण इलाकों की हवा में तांबा, कैलशियम, गंधक, एल्युमीनियम और बेरियम प्रदूषण फैलाते हैं। उल्लेखित धातुओं के अंश कोहरे के साथ मिलकर अनेक दिनों तक हवा में बने रहते हैं। उनके हवा में मौजूद रहने के कारण प्रदूषण का स्तर कुछ समय के लिये काफी बढ़ जाता है। विदित है कि विभिन्न कारणों से देश के अनेक इलाकों में वायु प्रदूषण सुरक्षित सीमा से अधिक है। ऐसे में पटाखों से होने वाला प्रदूषण, भले ही अस्थायी प्रकृति का होता है, उसे और अधिक हानिकारक बना देता है। औद्योगिक इलाकों की हवा में विभिन्न मात्रा में राख, कार्बन मोनोऑक्साइड, कार्बन डाइऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड और अनेक हानिकारक तथा विषैली गैसें और विषाक्त कण होते हैं। उन इलाकों में पटाखे फोड़ने से प्रदूषण की गंभीरता तथा होने वाले नुकसान का स्तर कुछ दिनों के लिये बहुत अधिक बढ़ जाता है।

महानगरों में वाहनों के ईंधन से निकले धुएं के कारण सामान्यतः प्रदूषण का स्तर सुरक्षित सीमा से अधिक होता है। पटाखे उसे कुछ दिनों के लिये बढ़ा देते हैं। उसके कारण अनेक जानलेवा बीमारियों यथा हृदय रोग, फेफड़े, गालब्लेडर, गुर्दे, यकृत एवं कैंसर जैसे रोगों का खतरा बढ़ जाता है। इसके अलावा, पटाखों से मकानों में आग लगने तथा लोगों खासकर बच्चों के जलने की सम्भावना होती है हवा के प्रदूषण के अलावा, पटाखों से ध्वनि प्रदूषण होता है। कई बार शोर का स्तर सुरक्षित सीमा को पार कर जाता है। यह शोर कई लोगों तथा नवजात बच्चों की नींद उड़ा देता है। नवजात बच्चों और कतिपय गर्भवती महिलाओं को तो वह डराता है। वह पशु-पक्षियों तथा जानवरों के लिये भी अभीष्ठ नहीं है।

उल्लेखनीय है कि केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण मंडल ने सुरक्षित सीमा (125 डेसीबल) से अधिक शोर करने वाले पटाखों के जलाने पर रोक लगाई है। इसके अलावा शान्तिपूर्ण माहौल में नींद लेने के आम नागरिक के फंडामेंटल अधिकार की रक्षा के लिये उच्चतम न्यायालय ने दीपावली और दशहरे के अवसर पर रात्रि 10 बजे से लेकर सुबह 6 बजे तक पटाखों के चलाने को प्रतिबन्धित किया है। इसके अतिरिक्त, पटाखे पृथ्वी के जीवन कवच ”ओजोन परत“ को भी भारी नुकसान पहुँचाते है। पटाखों से निकले धुएँ के कारण वातावरण में दृश्यता घटती है। दृश्यता घटने से वाहन चालकों कठिनाई होती है और कई बार वह दुर्घटना का कारण बनती है। इसके अलावा पटाखे बनाने वाली कम्पनियों के कारखानों में होने वाली दुर्घटनाएं और मौतें कुछ ऐसे मुद्दे हैं जिनसे सबक लेना चाहिए। इन मुद्दों में स्वास्थ्य मानकों की अनदेखी, बाल मजदूरी नियमों की अवहेलना या असावधानी मुख्य हैं।

इन सब दुष्परिणामों के बाद सवाल है कि क्या पटाखें फोडना हमारे लिए जरूरी है ? क्या पटाखें फोडने से ही दीपावली मनाना संभव है ? क्या बिना पटाखों के दीपावली नहीं मनाई जा सकती है ? क्या पटाखें के जरिये हम अपने रूपयों मे आग नहीं लगा रहे है ? क्या पटाखें फोड़कर हम पर्यावरण प्रदुषण नहीं फैला रहे है ? क्या पटाखें फोड़ लेने से ही दीपावली की खुशियां मिलना संभव है ? क्या पटाखें फोड़ने से (आतिशबाजी) से रूपयों का अपव्यय नहीं है ? करोड़ों सूक्ष्म जीवों ने हमारा और आप का क्या बिगाड़ा हैं ? कुछ नहीं ना, तो हम पटाखे छोड के उन सूक्ष्म जीवों को क्यू मारे, और क्यू लाखों भवो के वैर का बंध करें ?

जो लोग धार्मिक परम्पराओं की मुहिम लेकर सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले पर अनिच्छा जताते है। उन्हें भी बताना चाहूंगा कि धर्म ग्रंथों में दीये जलाने की बात कही गयी है। आतिशबाजी का नामोनिशान तक नही है। पूर्वजों में भी इन्हीं का पालन किया दीये जलाकर, रंगबिरंगी रोशनी के माध्यम से इस पर्व को खुशी की सौगात दी है। ज्यादा ही मनिच्छा हुई तो फुलझड़ी जला के मन को प्रसन्न कर लिया। आतिशबाजी और पटाखेबाजी केवल आधुनिक विकृतियां है। बेकार की फिजूलखर्ची है। क्षण भर में लाखों रुपयों का नुकसान के साथ साथ अमूल्य पर्यावरण को भी हानि है। न्यायालय के फैसले से कईं पटाखा उद्यमी बेरोजगार होने के भी तर्क दे रहे हैे। उन्हें कहना चाहूंगा की हर साल फेक्ट्री, गोदामांे, दुकानों में पटाखों के विस्फोटों से सैकड़ो कामगार मौत के मुंह में चले जाते है। उस समय आप कहां रहते हो ? इस उद्योग से जुड़े लोग अन्य सुरक्षित व्यवसाय की तलाश कर लेनी चाहिए। हमें सर्वोच्च न्यायालय के इस लोकहित फैसले को हिन्दू-मुस्लिम दृष्टिकोण से न देखते हुए मानवीय नजरिया रखते हुए ”शुभ दीपावली अशुभ पटाखा“ की परंपरा की शुरुआत कर देनी चाहिए।

– देवेंद्रराज सुथार
लेखक जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय जोधपुर में अध्ययनरत है।
संपर्क – गांधी चौक, आतमणावास, बागरा, जिला-जालोर, राजस्थान। 343025

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