उपहास का फल

जैन पाठशाला

अनिमेष उपाध्याय
अनिमेष उपाध्याय
कहते हैं कि व्यक्ति समय के साथ जीवन से बहुत कुछ सीखता चला जाता है। जीवन घटित घटनाओं से ही सीख लेता है और बहुत सारी घटनाएँ बाल्यावस्था में ही घटित होती हैं जो हमें जीवन के कुछ मूल्य सीखा जाती हैं । मेरी बाल्यावस्था का एक संस्मरण जो कि मुझे जीवन भर के लिए एक सीख दे गया । मेरे पाठ-शालीन दौर में पहली से लगा कर बारहवीं तक में मेरी दस पाठशालाएंँ बदली गयीं, कुछ मेरे पिताजी के स्थानांतरण के कारण और बहुत कुछ मेरे पढ़ाई में कमजोर होने के कारण । उनमें से एक पाठशाला थी जैन पाठशाला । शायद ये संस्मरण दूसरी कक्षा का है। मैं पढ़ाई में कमजोर था मन पढ़ाई से ज्यादा खेल-कूद और अन्य कामों में लगता था। परीक्षा के समय भी पढ़ाई पर ध्यान नहीं देता था मुझे ऐसा लगता था कि पढ़ाई मेरे लिए एक ज़बरदस्ती थोपी गई चीज है। चाह कर भी पढ़ाई करनी पड़ती थी।मेरे लिए भविष्य से अनजान पढ़ाई का महत्व बस इतना था कि माता-पिता के आग्रह के कारण मैं पाठशाला जाता था वहाँ भी मन नहीं लगता था।
धीरे-धीरे “गणित” में मेरी रुचि जागी, क्योंकि उसमें न ज्यादा लिखना पड़ता था न ज्यादा रट्टे मारना पड़ता था ।काम उंँगलियों पर ही हो जाता था । बाकी सब विषयों में डब्बा गुल था। परीक्षा के समय की बात है गुरु जी ने परीक्षा की समय सारणी बताई, मैं खुश था कि पहला पर्चा गणित का है बाकी सब पर्चों का भी बहुत तनाव था लेकिन उससे ज्यादा मुगालते भी थे कि सब समय पर कर लूँगा। समय बीत गया और गणित के पर्चे दिन परीक्षा देने पहुँचा पर्चा बहुत सरल लगा और उसे भरते-भरते मेरी नजर मेरे एक सहपाठी पर पड़ी और उसकी उत्तर पुस्तिका में कुछ नहीं लिखा था,मैंने ने जल्दी-जल्दी अपना पर्चा खत्म कर उस सहपाठी का उपहास उड़ाने लगा, उसकी आँखों मे आँसू थे और में उसका उपहास करे जा रहा था। उसने मुझे कोई पलट के जवाब नहीं दिया न कुछ कहा वह बस अपनी नम आँखों से मुझे देखता रहा और उत्तर पुस्तिका जमा कर, घर चला गया।इस घटना को मेरा एक सहपाठी देख रहा था । उत्तर पुस्तिका जमा करने का समय हो चुका था उसे जमा करके मैं सीधे घर चला गया । मैं सोच रहा था कि सारे पर्चे ऐसे ही जाएँ और जल्द ही परीक्षा से मुक्ति मिल जाए और गर्मी की छुट्टियाँ लग जाएँ । दूसरे दिन अन्य विषय का पर्चा था शायद सामाजिक विज्ञान का मुझे अच्छे से याद है पर्चे में आये एक भी सवाल का मुझे उत्तर मुझे याद नहीं था मेरी नज़र बार-बार उसी सहपाठी पर जा रही थी जिसका गणित का पर्चा खराब गया था अंत में जब पर्चा जमा करने के समय आया तो मेरी आँखों मे आँसू थे और मेरे कुछ सहपाठी मेरा उपहास उड़ा रहे थे मेरे दूसरे सहपाठी ने मुझे देख कर कहा “तू उस दिन उस पर हँस रहा था न इसलिए आज तेरे साथ ऐसा हुआ है।’’ उसी समय समझ आया कि किसी का उपहास उड़ाना हँसी उड़ाना बहुत गलत है। कभी न कभी कहीं-न-कहीं अपनी स्थिति भी उस व्यक्ति जैसी हो सकती है जिसका हमने कभी उपहास उड़ाया हो।
ये घटना घटने के बाद उस उम्र से ही मैंने सिख लिया था कि किसी का उपहास करना बहुत रोचक है लेकिन उपहास का पात्र बनना दुःखदाई है।
मेरी बाल्य स्वर्णिम स्मृतियों से
अनिमेष उपाध्याय
9406605051

Leave a Comment