नई पीढ़ी को गौरवपूर्ण इतिहास की याद दिलाता है पृथ्वीराज चौहान स्मारक

25 मई को सम्राट पृथ्वीराज चौहान की जयन्ति समारोह
prathvi raj chouchan smarakतारागढ़ की पहाडिय़ों पर समुद्र तल से 1750 फुट तथा भूमितल से 500 फुट उँचाई पर लगभग सवा लाख वर्गफुट में निर्मित पृथ्वीराज चौहान स्मारक एक ओर तो लोगों, विशेषकर नयी पीढ़ी, को अपने गौरवपूर्ण इतिहास की याद दिलाता है और पृथ्वीराज चौहान के जीवन से प्रेरणा प्रदान करता है तथा दूसरी ओर अजमेर में एक अनूठा पर्यटक स्थल विकसित हो।
अजमेर विकास न्यास के अध्यक्ष के रूप में श्री औंकार सिंह लखावत ने तारागढ़ पर्वत श्रृंखला में इस स्मारक के निर्माण की महत्वाकांक्षी योजना बनाई जिसे रात-दिन एक करके इसे पूरा कराया। इसका लोकार्पण श्री लालकृष्ण आडवाणी द्वारा 25 जनवरी 1996 को किया गया। लोकार्पण समारोह का दृश्य जब आंखों के सामने आता है तो ऐसा लगता है की चंदबरदाई खेल मैदान से इस स्मारक तक का चप्पा-चप्पा रंगबिरंगी पौशाक पहनें नर-नारियों, बुजुर्गों , युवाओं, बच्चों तथा राष्ट्र पे्रमियों से अटा पड़ा था।
श्री लखावत वर्तमान में राजस्थान धरोहर संरक्षण एवं प्रोन्नति प्राधिकरण के अध्यक्ष के दूसरे कार्यकाल के रूप में सम्पूर्ण राजस्थान के दूर दराज में स्थित पुरातन धरोहरों को संरक्षित करने में लगे हुए हैं। आदिकाल का पवित्र तीर्थ स्थल बूढ़ा पुष्कर का भी जार्णोद्घार और यहां पर विभिन्न आकर्षक घाटों का निर्माण सभी समाज व जन सहयोग से कराने का श्रेय भी राजस्थान की मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे एवं श्री औंकार सिंह लखावत को जाता है।
जोधपुर पत्थर के 16.6 फुट के आधार-स्तंभ पर 6.6 फुट उंची घोड़े पर सवार पृथ्वीराज चौहान की नयनाभिराम प्रतिमा लगाई गई है। प्रतिमा के नीचे पृथ्वीराज चौहान के तत्कालीन साम्राज्य का आकर्षक चित्रण है। यहां बनायी गयी विभिन्न दीर्घाओं में क्रमश: पृथ्वीराज चौहान, उनकी पत्नी संयोगिता, महान कवि चन्दरबरदाई तथा सेनानायक संयमराज के आकर्षक चित्र हैं, जो हमारे गौरवपूर्ण इतिहास की रोचक झलक देते हैं। आकर्षक रॉक गार्डन एवं बच्चों के मनोरंजन पार्क तथा झूले इस स्मारक की अतिरिक्त विशिष्ठता है वहीं चामुण्डा माता की तेजस्वी प्रतिमा स्मारक के वातावरण को भक्तिमय बना देती है। दूर-दूर तक नजर आती पहाडिय़ां सुरम्य स्थल की रमणीयता में कई गुना वृद्घि करती हैं।
स्मारक तक पहुंचने के लिए पहाडिय़ों को काटकर लगभग 4 किलोमीटर लम्बी सड़क बनायी गयी है। इस स्मारक से तारागढ़ दुर्ग के अन्तिम छोर तक पहुंंचने के लिए दुर्गम पहाडिय़ों को काटकर 4 किलोमीटर लम्बी सड़क और बनायी गयी है। ऊंचे पहाड़ों को काटकर ये सड़कें बनाना अत्यंत दुष्कर कार्य था किन्तु नगर विकास न्यास के प्रयासों से यह संभव हो ही गया।
तारागढ़ दुर्ग भूमितल से लगभग 800 फुट उपर बना हुआ है। इस दुर्ग के परिसर में अनेक प्राचीन इमारतें, बावडिय़ा स्थित है। तारागढ़ तक पूरी सड़क बन जाने से यह पर्यटक केन्द्र के रूप में विकसित हो गया है। सातवीं शताब्दी में राजा अजयपाल द्वारा निर्मित तारागढ़ का नाम पहले अजयमेरू दुर्ग था। उस समय अजमेर का नाम भी अजयमेरू था। बाद में अजयमेरू के शासक ने अपनी पत्नी ताराबाई के नाम से इस गढ़ का नाम तारागढ़ कर दिया।
इतिहास के मूक गवाह तारागढ़ ने अपनी स्थापना के लगभग एक हजार चार सौ सालों में अनेक युद्घ तथा अपनी मातृभूमि पर मर-मिटने वाले हिन्दू राजाओं के शौर्य को देखा। अंंतिम हिन्दू सम्राट पृथ्वीराज चौहान ने भी तारागढ़ पर फहरने वाले अपने राष्ट्रध्वज की रक्षार्थ अनेक युद्घ किए। इतिहासकारों ने पृथ्वीराज चौहान द्वारा किए गए युद्घों और उनकी देशभक्ति व वीरता को सदैव निर्विवाद माना है।
पृथ्वीराज चौहान स्मारक इसी गौरवपूर्ण इतिहास का एक ऐसा झरोखा है, जहां बैठकर इतिहास में झांकने पर अपनी सभ्यता और अपनी संस्कृति पर गर्व होता है तथा राष्ट्र के लिए कुछ कर गुजरने की प्रेरणा जन्म लेती है।
सम्राट पृथ्वीराज चौहान की जीवनी अत्यन्त पे्ररणादायी है। वे भारतीय इतिहास की ऐसी महान विभूति हैं, जिन्होंने राष्ट्र की अखंडता-अक्षुण्यता को जीवन का सर्वोपरि और परम ध्येय बनाया तथा जीवन के अंतिम क्षण व शरीर में रक्त की आखिरी बूंद तक अपने ध्येय की पूर्ति में जुटे रहकर शहीद हो गये। चौहान कुलावंतस पृथ्वीराज महापराक्रमी, प्रजावत्सल, पुण्यप्रतापी, विधाओं एवं कलाओं में मर्मज्ञ, शस्त्र व शास्त्र के ज्ञाता तथा आन बान के धनी थे।
सम्राट पृथ्वीराज अजयमेरू के शासक राजा सोमेश्वर एवं रानी कर्पूरीदेवी की संतान थे। उनका जन्म ज्येष्ठ बदी द्वादश सम्वत 1223 (सन 1166) में हुआ। मात्र ग्यारह वर्ष की अल्पायु में उनका राज्याभिषेक हुआ। उनका तत्कालीन साम्राज्य हर्षवद्र्घन के राज्य से भी बड़ा था।
कुछ ऐतिहासिक पुस्तकों के अनुसार वे चौदह विद्याओं मीमांसा, धर्मशास्त्र, गणित, सैन्य, चिकित्सा, विज्ञान, संगीत, कला आदि के ज्ञाता थे। पृथ्वीराज चौहान धर्नुविद्या विशारद, अचूक तीरंदाज थे और उन्हें शब्दबेधी बाण में सिद्घहस्तता प्राप्त थी। वे छ: भाषाओं संस्कृत, प्राकृत, अपभं्रश, पैशाची, मागधी, तथा सूरसैनी, के ज्ञाता थे। वे एक ओर तो अपनी सीमाओं की रक्षा के लिये सदा चौकन्ने रहते थे तथा दूसरी ओर जनहित के प्रति भी सदैव जागरूक रहा करते थे। उनके मित्र अपनी तरह के अनूठे कवि चंदरबरदाई उन्हें अपनी कविताओं के माध्यम से प्रेरणा प्रदान किया करते थे।
अजयमेरू से दिल्ली तक के वृहत साम्राज्य को संचालित करने वाले पृथ्वीराज चौहान ने अपने जीवनकाल में विदेशी-विधर्मी आक्रामकों की हिन्दूस्तान विजय की ख्वाहिश पूरी नहीं होने दी। पृथ्वीराज एक युग के, उस संकल्प के प्रतीक पुरूष बने जिससे विधर्मी आक्रामकों के स्वप्नों को चूर करने की जनभावनाओं को प्रकट किया। मौहम्मद गौरी से पृथ्वीराज ने अनेक युद्घ किये, जिनमें से एक छोड़कर शेष युद्घों में गौरी ने मुँह की खायी। 1161 ई. एवं 1162 ई. में गौरी परास्त होकर भाग छूटा, लेकिन 1162 ई. में ही सेना लेकर पुन: आ धमका। पृथ्वीराज भी मैदान में जा डटे।

प्यारे मोहन त्रिपाठी
प्यारे मोहन त्रिपाठी

हर बार हारने वाले गौरी को उन्होंने युद्घ मैदान से लौट जाने का पत्र लिखा। लेकिन, गौरी इस बार षड्यंत्र से युद्घ जीतना चाहता था। उसने जवाब में समय मांगा और सेना पीछे ले ली। पृथ्वीराज ने समझा गौरी मैदान छोड़ रहा है। लेकिन यह उसके षड्यंत्र का हिस्सा था। गौरी ने धोखे से अचानक आक्रमण कर दिया। पृथ्वीराज हिन्दुस्तानी सांस्कृतिक परम्परा के प्रति अपनी दृढ़ निष्ठा प्रकट कर चुके थे।
पृथ्वीराज के समक्ष मौहम्मद गौरी ने उन्हें विधर्मी हो जाने का विकल्प प्रस्तुत किया था, लेकिन उन्हें तो स्वदेश और स्वधर्म प्राणों से भी अधिक प्रिय थे। संकल्प के धनी पृथ्वीराज ने नेत्रहीन हो जाने के बावजूद राष्ट्र रक्षा के अपने ध्येय को क्षीण नहीं होने दिया। संकल्प पूर्ति में पृथ्वीराज ने सहायक बनाया अपने कवि मित्र चंदबरदाई को। चंदबरदाई जब बंदीगृह में पृथ्वीराज से मिलने गये तो दोनों ने बुद्घि कौशल से विदेशी आक्रामकों के नाश की योजना बनाई। योजनानुसार चंदबरदाई ने मौहम्मद गौरी से सम्पर्क कर कहा कि पृथ्वीराज का शब्दबेधी बाण चलाने में आज भी कोई सानी नहीं है, चाहे तो वह परीक्षण कर सकता है। गौरी ने पहले तो उपहास उड़ाया, लेकिन बाद में वह परीक्षण के लिये तैयार हो गया। उसने एक निश्चित उँचाई पर लोहे के सात तवे लगवा दिये और इस दृश्य को देखने के लिये स्वयं महल के उपर बैठ गया। पृथ्वीराज को वहां लाया गया, उसने निशाना साधा, कवि चंदबरदाई ने चार बांस चौबीस गज एवं अष्ट अंगुल की दूरी पर स्थित लक्ष्य की एक दोहे में सूचना दी। पृथ्वीराज चौहान ने एक बाण चलाया जिसने असली लक्ष्य को भेद दिया।
पृथ्वीराज चौहान की प्रेरणादायी जीवन-गाथा हर युग, हर काल में प्रासंगिक है। यह जनता को देशभक्ति और शासकों को जनहित एवं राष्ट्र रक्षा के लिये सब कुछ न्यौंछावर करने की प्रेरणा देती है।
-प्यारे मोहन त्रिपाठी,
उप निदेशक
सूचना एवं जनसम्पर्क

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