प्रभु कृपा मानकर आनंद का अनुभव कीजिएः मैथिलीषरण भाईजी

Photo Ramkatha-लखनलाल असाटी – छतरपुर, । जीवन में जो भी प्राप्त हो उसे प्रभु कृपा के रूप में स्वीकार कर उसमें आनंद का अनुभव करना ही सच्चे भक्त का जीवन दर्षन है। प्रभुकृपा के अतिरिक्त हम जो भी चाहते हैं, वह वासना है जिसका कोई अंत नहीं है। यह उपदेष मैथिलीषरण भाईजी ने कल्याण मंडपम में सप्तदिवसीय रामकथा रामकिंकर प्रवचन माला के पहले दिन दिया। कथा आयोजक कल्याणदास धर्मषाला एवं चेरिटेबल ट्रस्ट के अध्यक्ष जयनारायण अग्रवाल जयभैया ने प्रारंभ में रामायण की आरती की। वरिष्ठ पत्रकार विनीत खरे ने स्वागत उद्बोधन दिया। बुंदेलखंड परिवार की लाड़ली बेटियों श्रुति अग्रवाल एवं सुमति अग्रवाल ने सभी का स्वागत करते हुए भाईजी को जन्मदिन की बधाई दी।
भाईजी ने नवधा भक्ति प्रसंग का आरंभ भगवान श्रीराम के जटायु मिलन की कथा से किया और कहा कि भगवान का आग्रह होने के बावजूद जटायु ने शरीर रखने की जगह देह त्यागने की इच्छा व्यक्त की। श्रीराम ने जटायु को चतुर्भुज रूप प्रदान कर परम धाम को भेज दिया। भगवान का सच्चा भक्त भी भगवान से शरीर हेतु याचना नहीं करता है। भाईजी ने कहा कि जटायु, कागभुषुंडि, शबरी आदि सभी भक्तों ने भगवान से कभी कोई सांसारिक वस्तु नहीं मांगी। जब भगवान स्वयं सम्मुख में उपस्थित हों तो और क्या मांगना। सीताजी ने भगवान राम के समीप होने पर भी सोने का मृग पाने के लिए उन्हें अपने से दूर कर दिया जिस कारण उन्हें राम से दूर लंका में निवास करना पड़ा।
भाईजी ने बताया कि स्वामी अखंडानंद कहा करते थे कि सच्ची भक्ति का उद्देष्य भगवान का पाना भी नहीं है पर पूर्ण भक्ति का फल तो सिर्फ भक्ति ही है। चित्रकूट में कामतानाथ की तथा वृंदावन में गोवर्धन की बार-बार परिक्रमा करना अथवा एक ही माला से बार-बार जप करना वास्तव में बार-बार आनंद की सृष्टि करना ही तो है। यही परिक्रमा भक्ति है।
दृष्टि बदलने से ही बदलेगी सृष्टिः-
रामकथा कहते हुए भाईजी ने कहा कि व्यक्तियों को जो प्राप्त है उसमें वे प्रसन्न नहीं दिखाई देते हैं इसके लिए दृष्टि बदलने की जरूरत है। महापुरूष व गुरू की कृपा से व्यक्ति की दृष्टि बदली जा सकती है। प्रसिद्ध संत चरणदासजी से किसी ने पूछा कि आपको आपके गुरू ने क्या दिया तो उन्होंने कहा कि
‘‘चरणदास गुरू किरपा कीन्हीं। उलट गई मन नैन पुतरिया।।’’
बेटियां पैदा नहीं होंगी तो सृष्टि समाप्त हो जाएगी-
भाईजी ने कहा कि दृष्टि बदल दीजिए तो समृद्धि आ जाएगी। उन्होंने उदाहरण देकर कहा कि यदि संसार के सभी दंपत्ति भगवान से सिर्फ पुत्र ही पुत्र की कामना करे और संसार में पुत्रियां पैदा होना बंद हो जाएं तो कुछ दषकों बाद तो सारी सृष्टि ही खत्म हो जाएगी। क्योंकि नारी की कृपा के फलस्वरूप ही सृष्टि का सृजन होता है। बिना स्त्री के क्या सृष्टि संभव है।
भाईजी ने नवधा भक्ति पर प्रकाष डालते हुए कहा कि शबरी ने आजीवन अपने गुरू मतंग मुनि की सेवा की और जब मतंग मुनि देह त्यागने लगे तो शबरी ने भी देह त्यागने की इच्छा व्यक्त की पर मुनि ने शबरी को रोकते हुए कहा कि अभी तो तुम्हें भक्ति का फल मिलना शेष है। भगवान श्रीराम जब शबरी के आश्रम पहुंचे तो उनका सुंदर स्वरूप देखकर शबरी को मुनि के वचन याद हो आए। शबरी ने श्रीराम से याचना की कि उसके पास तो साधन का अभाव है, ज्ञान का अभाव है तथा वह जाति से शूद्र व स्त्री है
‘‘अधम ते अधम अधम अति नारी। तिन्ह महॅं मैं मतिमंद अघारी।।
वह कैसे भगवान को पा सकती है। भगवान ने शबरी की बातों का खंडन करते हुए उसे समझाया
‘‘जाति-पॉति कुल धर्म बड़ाई। धन बल परिजन गुन चतुराई।।’’
‘‘भगति हीन नर सोहइ कैसा। बिनु जल बारिद देखिअ जैसा।।’’
अर्थात जाति, पॉति, कुल, धर्म, बड़ाई, धन बल, कुटुम्ब, गुण और चतुरता ये दस वस्तुएं व्यक्ति के अभिमान का केंद्र होती हैं। भगवान श्रीराम शबरी से कहते हैं कि भक्ति के बिना ये वस्तुएं उसी तरह शोभाहीन हैं जैसे कि जल के बिना बादल। भाईजी ने कहा कि हनुमानजी जब रावण की राजसभा में पहुंचे तो उन्हें वहां सारी विषेषताएं देखने मिलीं पर एक विषेषता राम से प्रेम वहां देखने नहीं मिली।
‘‘राम विमुख संपत्ति प्रभुताई। जाई रही पाई बिनु पाई।।’’
राम से विमुख होकर संपत्ति और प्रभुता का पाना न पाने के समान है। भाईजी ने बताया कि कई बार लोग कह सकते हैं कि जो लोग राम का नाम लेते हैं वह अभावग्रस्त दिखाई देते हैं जबकि राम का नाम न लेने वाले साधन संपन्न है। पर वास्तव मेें ऐसे लोग कुली की तरह संपत्ति सिर और कंधों पर ढोने का काम कर रहे होते हैं। जो उनकी अपनी नहीं होती है। भाईजी ने कहा कि आज समाज में कई व्यक्ति कुली की तरह पद, सम्मान, ऐष्वर्य ढोते रहते हैं पर वास्तव में जीवन में उन्हें उस पैसे का सुख नहीं मिल पाता हैं।
पद को सबसे नीचे रखिएः-
पद अर्थात पैर शरीर में सबसे नीचे होते हैं और सिर सबसे ऊपर। लोगों को बड़े-बड़े पद मिल जाते हैं, पदाधिकारी को समझना चाहिए कि जो पद उन्हें मिला है उसे सबसे नीचे रखना है। जिस तरह शरीर भार संभालने के लिए पद अर्थात पैर होते हैं उसी तरह कार्यभार संभालने के लिए सांसरिक पद होते हैं। इन पदों को कभी सिर पर मत रखिए।
भाईजी ने मनु के पुत्र उतानुपाद की रानियों सुरूचि-सुमति तथा उनके पुत्रों उत्तम-धु्रव की कथा सुनाते हुए कहा कि जिसका पद अभिमान धारण कर लेता है वह उत्तानुपाद हो जाता है। परिवारों में कहासुनी व मतभेद इसलिए हो जाते हैं क्योंकि बड़ा व्यक्ति भूल जाता है कि वह बड़ा है और छोटा व्यक्ति भूल जाता है कि वह छोटा है। अपनी स्थिति को भूल जाना ही मतवाला हो जाना है। दूसरों का उपहास करने वाला क्षमता और योग्यता से अधिक पा लेने वाला व्यक्ति भी मतवाला हो जाता है।
भाईजी ने कहा कि परिवार में एक व्यक्ति के सोचने का ढंग महाभारत भी करा सकता है और रामायण भी। रामकिंकर जी कहा करते थे संसार में प्रायः जैसा होता है वह महाभारत है और जैसा होना चाहिए वह रामायण है। द्वापर युग में यदि गांधारी के गर्भ से दुर्योधन की जगह भरत ने जन्म लिया होता तो महाभारत में भी रामायण हो जाती और त्रेता में माता कैकई यदि दुर्योधन को जन्म देतीं तो रामायण में भी महाभारत हो जाती।
सत्संग के अभाव में व्यक्ति सही निर्णय नहीं लेताः-
नवधा भक्ति में ‘‘प्रथम भगति संतन्ह कर संगा’’ की विवेचना करते हुए मैथिलीषरण भाईजी ने कहा कि सत्संग का जीवन में बहुत अधिक महत्व है। संसार से राग की जगह विराग हो जाए और भगवान के प्रति राग बढ़ जाए यही सत्संग है। मन लगे न लगे सत्संग करते जाइये, कथा सुनते जाइये जीवन में परिवर्तन सुनिष्चित है। उन्होंने कहा कि यदि सत्संग के बाद भी परिवर्तन नहीं हो तो समझ लीजिए कि हम रावणत्व की ओर बढ़ रहे हैं। क्योंकि सत्संग में दूसरों की बात सुननी पड़ती है पर अहंकारी व्यक्ति को दूसरों की बात अच्छी नहीं लगती। सत्संग के अभाव में व्यक्ति सही निर्णय नहीं ले पाता।
भाईजी ने रावण और लंकिनी का उदाहरण देते हुए कहा कि हनुमानजी ने दोनों को ही सत्संग का मुक्का मारा पर रावण के जीवन में परिवर्तन नहीं हुआ। जब व्यक्ति यह सोचे कि वह जो सोचता है सिर्फ वही सही है तो किसी को कितना भी सुन लिया जाए कोई असर नहीं होता है। संत ओंकारानंद जी कहा करते थे कि कथा में बुलेट पू्रफ जैकेट पहनकर बैठोगे तो सत्संग की गोलियां कैसे असर करेंगी। हनुमानजी जब लंका में मसक रूप में प्रवेष करते हैं तो लंकिनी उन्हें रोकते हुए कहती है-
‘‘जानेहि नहीं मरमु सठ मोरा। मोर अहार जहॉं लगि चोरा।।’’
अर्थात तू मुझसे पूछे बगैर कहां जा रहा है, चोर तो मेरे आहार हैं। तब हनुमानजी ने उसे एक मुक्का मारा।
‘‘मुठिका एक महा कपि हनी। रूधिर बमत धरनीं ढनमनी।।’’
और पूछा कि तूने सीता की चोरी करने वाले रावण को अब तक क्यों नहीं खाया। लंकिनी तब तक रावण को साहूकार और हनुमानजी को चोर समझ रही थी। सत्संग का मुक्का पड़ते ही उसके जीवन में परिवर्तन आ गया और वह कहने लगी-
‘‘तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग। तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग।।’’
पर रावण के जीवन में सत्संग से भी परिवर्तन नहीं आया जिस कारण उसका सर्वनाष हो गया।
प्रभु केा पाने के लिए सांसारिक साधनों की जरूरत नहींः-
शबरी प्रभु श्रीराम से अपने साधनहीन होने का निवेदन करती है तो भगवान ने कहा कि साधन की कोई जरूरत नहीं है। मन में कुटिलता न हो तथा सरल स्वभाव हो बस यही पर्याप्त है।
‘‘कहहु भगित पथ कवन प्रयासा। जोग न मख जप तप उपवासा।।
सरल स्वभाव न मन कुटिलाई। जथा लाभ संतोष सदाई।।’’
भाईजी ने कहा कि संसार में भले ही साधन होने पर सम्मान मिलता हो पर भगवान के पास सम्मान तभी प्राप्त होगा जब आपके पास सब कुछ होकर भी आपको उसके होने का अहं न हो। नवधा भक्ति की दूसरी भक्ति ‘‘दूसरि रति मम कथा प्रसंगा’’ का विस्तारपूर्वक वर्णन करते हुए भाईजी ने कहा कि रति का अर्थ ऐसे प्रेम से है जिसके बगैर रहा न जाए। भगवान से रति हो जाएगी तो संसार से विरति स्वाभाविक है।
पिता दषरथ से कम त्याग नहीं था माताओं काः-
भगवान श्रीराम के वनवास पर पिता दषरथ, माताएं कौषल्या, सुमित्रा, कैकई, भाई भरत व अयोध्यावासियों की भावनाओं और भूमिकाओं का भी भाईजी ने अद्भुत विष्लेषण करते हुए कहा कि रामवियोग में राजा दषरथ ने प्राणों का परित्याग कर दिया।
‘‘बंदउॅ अवध भुभाल सत्य प्रेम जेहि राम पद। बिछुरत दीनदयाल प्रिय तनु तृन इव परिहरेउ।।’’
लोग कहते हैं कि क्या पिता दषरथ की तरह माताओं को राम से सच्चा प्रेम नहीं था। माताओं ने प्राण क्यों नहीं त्यागे। भाईजी ने कहा कि राम के विरह में जीवित रहकर चौदह वर्ष तक उनका इंतजार करना तो और भी अधिक कष्टप्रद था। वनवास से लौटकर भगवान अयोध्या में माताओं को न पाकर कितने अधिक दुखी होंगे यही सोचकर सिर्फ माताएं जीवित बनी रहीं। इसीलिए माताओं ने सती होकर स्वयं को महिमामंडित करने के स्थान पर वियेाग की पीड़ा झेलकर भगवान के अयोध्या लौटने की प्रतीक्षा की।
श्रीराम को मनाने जब अयोध्यावासियों के साथ भरत चित्रकूट जाने लगते हैं तो अयोध्यावासियों की भावनाएं कुछ इस प्रकार हैं-
‘‘जरउ सो संपति सदन सुखु सुहद मातु पितु भाई। सनमुख होत जो राम पद करै न सहस सहाइ।।’’
कि राम के सहर्ष सम्मुख होने में बाधक सुख, संपत्ति, भवन, भाई, माता-पिता जल जाने योग्य हैं। पर भरत ऐसा नहीं सोचते। उन्होंने अयोध्या की संपत्ति को जलाने के बजाय उसकी सुरक्षा के प्रबंध किए।
‘‘संपति सब रघुपति के आही। जौं बिनु जतन चलौं तजि जाही।।
तो परिनाम न मोरि भलाई। पाप सिरोमनि साइॅं दोहाई।।’’
लोग कह सकते हैं कि भरतजी से अधिक वैराग्य तो अयोध्यावासियों में दिखाई देता है पर सच्चाई यह है कि भरतजी को राम से इतनी अधिक रति है कि वह उनकी संपत्ति की सुरक्षा करना भी अपना दायित्व समझते हैं। भरतजी के त्याग के दर्षन तो चित्रकूट जाते समय त्रिवेणी पर होते हैं जहां वह तीर्थराज प्रयाग से प्रार्थना करते हैं-?
‘‘अरथ न धरम न काम रूचि गति न चहउॅ निरवान। जनम जनम रति राम पद यह बरदानु न आन।।’’
माता सुमित्रा के त्याग की चर्चा करते हुए भाईजी ने कहा कि जब लक्ष्मण को शक्ति लगने की खबर माता सुमित्रा ने सुनी तो उन्होंने दुखी होने की जगह तुरंत अपने दूसरे पुत्र शत्रुघ्न से कहा कि अब तुम्हें वन जाकर भगवान श्रीराम की सेवा और सहायता करनी है। कैकई ने भी 14 वर्ष अयोध्या में घोर अपमान के साथ बिताया। परिजन व पुरजनों ने उनका सम्मान नहीं किया। पुत्र भरत ने उन्हें माता की जगह सदैव महारानी कहकर पुकारा। अयोध्या वापसी पर प्रभु श्रीराम सबसे पहले माता कैकई से मिले और उनकी कुषलता पूछी। तब माता कैकई ने बताया कि भरत उन्हें कभी माता नहीं कहता है। इस पर भरतजी ने श्रीराम को बड़ा ही भावपूर्ण उत्तर दिया कि जिसे राम स्वयं अपनी माता स्वीकार कर माता संबोधित करते हैं उसे अब संसार में किसी और से माता कहलवाने की क्या जरूरत है। भाईजी ने बताया कि अयोध्या में 14वर्ष तक न तो किसी ने जन्म लिया और न ही कोई मौत हुई। सभी ने प्रभु श्रीराम के लौटने की प्रतीक्षा की। प्रभु में ऐसे ही रति होनी चाहिए।
‘सीय राम मय सब जग जानी। करउॅं प्रनाम जोरि जुग पानी।।’’
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