-सुमित सारस्वत- ब्यावर। नारायण आश्रम में आयोजित संगीतमय श्रीमद् भागवत कथा का गुरुवार को विश्राम हुआ। अंतिम दिन कथा वाचक संत रमेश भाई ओझा ने कहा कि मन पुष्प के समान है। पुष्प खिला हुआ सुंदर लगता है उसी तरह मन भी प्रसन्नचित रहने पर ही अच्छा अनुभव करता है। हमेशा हंसते-मुस्कुराते रहें।भाईश्री ने कहा कि इंसान भूत के शोक और भविष्य की चिंता में वर्तमान खराब कर रहा है। शोक, मोह व भय को हर ले, वही भक्ति है। आज को जीएं। परमात्मा से प्रेम करें। जहां प्रेम है, वहीं सुख है। ‘बिनु सत्संग विवेक न होई…’ श्लोक से समझाया कि जीवन में विवेक होना बेहद जरूरी है। जिस तरह स्वस्थ रहने के लिए प्रतिदिन व्यायाम जरूरी है। उसी तरह परमात्मा की प्राप्ति के लिए नित्य सत्संग जरूरी है। भाईश्री ने कहा कि प्रभु को पाने की चाह सभी को है मगर गलत राह में भटक रहे हैं। वासना अपने सुख की चिंता करती है। वासना का त्याग करें। प्रभु को पाने के लिए स्वयं को समर्पित करना पड़ता है। ‘ये इश्क नहीं आसां, बस इतना समझ लीजिए..’ शायरी से समझाया कि प्रेम साहसी लोग करते हैं। प्रेम में देह नहीं, भाव चाहिए। कृष्ण प्रेम में पागल हो जाने पर धर्म की भी आवश्यकता नहीं रहती। प्रभु से प्रीत ऐसी हो कि उससे उसी को मांगो।
गुरु-शिष्य के पवित्र रिश्ते की व्याख्या करते हुए संतश्री ने बताया कि आकर्षित होकर किसी व्यक्ति विशेष को गुरु बनाना गलत है। कुछ लोग महज संख्या बढ़ाने के लिए शिष्य बना लेते हैं। गुरु मत बनाओ, शिष्य बनो। शिष्य तभी बना जा सकता है जब हम सर्वस्व अपने गुरु को समर्पित कर सकें। अगर कोई उचित गुरु ना मिले तो वेद और ग्रंथ को गुरु बनाएं। सिख धर्म भी गुरु ग्रंथ साहिब की पूजा करता है। आत्मविश्वास परमात्मा के विकास से होना चाहिए, अन्यथा अहंकार बन जाता है। अच्छाई का अहंकार बुराई है। बुराई का अंत गुरु शरण में ही संभव है। भाईश्री ने शाकाहार अपनाने का संदेश देते हुए कि जो प्राणी जीभ से पानी पीता है वो मांसाहारी है और जो होंठ से पानी पीता है वो शाकाहारी है। होंठो से पानी पीने वाला मनुष्य भी शाकाहारी है। अगर मनुष्य शाकाहार का सेवन करेगा तो स्वस्थ रहेगा। भाईश्री ने समझाया कि जिस तरह पेट्रोल के वाहन में डीजल डालने से इंजन खराब हो जाता है वैसे ही यदि शाकाहारी शरीर में मांसाहार जाएगा तो मनुष्य बीमार हो जाएगा।
भाईश्री ने भगवान कृष्ण की रासलीला और गोपियों के विरह का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि विरह का अनुभव उसे होता है जिसने मिलन का स्वाद चख लिया हो। विरह के भावुक प्रसंग पर भाईश्री के साथ हजारों श्रोताओं की आंखों से अश्रुधारा बहने लगी। भाईश्री ने ‘प्रेमी के प्रेम पथ पर मन हो गया दीवाना.., देना हो तो दीजिए, जनम जनम का साथ.., रात ढलने लगी, चांद बुझने लगा…’ गीतों के जरिए प्रेम व विरह की व्याख्या की। संत राधाकृष्ण महाराज ने भी कथा श्रवण किया। कथा विश्राम होने पर सुमित सारस्वत व अमित सारस्वत ने भाईश्री को उनकी विभिन्न मुद्राओं वाली छवि भेंट की। रामप्रसाद कुमावत ने कृष्ण प्रेम पर स्वरचित कविता भेंट की। जगद्गुरु शंकराचार्य निरंजनदेवतीर्थ के प्रपौत्र उमाकांत द्विवेदी ने माचिस की डिब्बी से भी सूक्ष्म भागवत भेंट की। आयोजक माणकचंद जिंदल ने ब्यावर में कथा आयोजन के लिए भाईश्री के प्रति कृतज्ञता प्रकट की। मंच संचालन राधेश्याम डाणी व रमेश बंसल ने किया।