छवी १- कोई तो आएगा

Devi N 1तस्वीरें बोलती है, गुफ्तगू करना उनकी फितरत है। मानो न मानो, वे हर देखने वाले के साथ उनके अपने नज़रिये से बतियाती है। उनका एक नहीं अनेक पहलू सामने आते हैं, कभी सकारात्मक, कभी नकारात्मक, कभी फूलों सी मुलायम महक लिए, कभी काँटों की ख़लिश लिए, कभी आसमानी राहतों का बायज बनकर ये रंग भरे अक्स हमें जीवन से जोड़ते की पहल करते हैं-आमीन!
1
1सूनी सी पगडँडी पर
इक आस अभी भी साँस ले रही है
आँखो में निर्जीव सी आशा बुझी हुई सी,
फिर भी जल रही है इंतज़ार में
कोई तो आयेगा इस राह पर?
देखे है चिन्ह मैंने जीवन के यहाँ पर
पदचिन्ह कहो या साँसों की धीमी सी आहट
महसूस की है हवाओं के इँतजार में,
सरसराहट सुन रही है जो
हाँ ! सुन रही है हवाएँ
जिंदगी की आहट
कोई तो आयेगा
यह सोच रही है!
2
अज़ल की प्यास
डरावनी ठँडी रात में
निर्भय होकर है खड़ा
तन्हा है, पर है बड़ा
वह “कैक्टस”
जो दूर क्षितिज पर
देख रौशनी की परछाई
ढाढस खुद को दे रहा है
कोई तो आएगा इस राह पर
आकर रुकेगा कुछ पल
पास मेरे, मेरी आस के लिये
मेरी प्यास के लिये
जो अज़ल से तरस रही है !
3
मैं तन्हा हूँ
रात खामोश, सूनी पगडँडी
न हलचल, न जीवन
बस खामोशी “मौत” सी
क्यों डरा रही है ?
उस रेतीले बँजर शहर में
कंटीली झाड़ी को, जो
महसूस तो करती है
पर कुछ नहीं सकती “मैं तन्हा हूँ ”
देवी नागरानी

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