ओडिय़ा-राजस्थानी कहानी अनुवाद कार्यशाला जोधपुर में सम्पन्न

Untitledजोधपुर,१६ जुलाई। साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली के तत्वावधान में तीन दिवसीय ओडिय़ा-राजस्थानी कहानी अनुवाद कार्यशाला रविवार को जोधपुर स्थित चन्द्राइन होटल में सम्पन्न हुई।
समापन समारोह के अवसर पर साहित्य अकादेमी में ओडिय़ा भाषा परामर्श मंडल के संयोजक कथकार डॉ. गौहरिदास ने कहा कि राजस्थानी भाषा अत्यंत प्राचीन होते हुए समृद्ध भाषा है, आधुनिक काल में राजस्थानी भाषा को लेकर कुछ लोगो द्वारा इस भाषा को मायन्ता नहीं देने हेतु भारत सरकार पर दबाव बनाया जा रहा है, जो कि निंदनीय है, सीमांत क्षेत्र में रहते हुए राजस्थानी भाषा हमारे देश की सीमाओं पर रहकर रक्षक के रूप में भी कार्य कर रहे है, राजस्थानी भाषा मिठास हमें सदैव अपनी ओर आकृषित करती है। डॉ. गौहरि ने कहा कि निकट भविष्य में हम राजस्थानी की विभिन्न विधाओं की रचनाओं का उडिय़ा मं अनुवाद करवाना चाहेंगे, उन्होंने कहा कि उडिया लेखकों के मन में राजस्थानी की प्रति अत्यधिक मान-सम्मान है। डॉ.गौहरि ने कहा कि राजस्थानी भाषा को तुरंत आठवी अनुसूची में शामिल किया जाना चाहिए। उन्होंने तीन दिन में राजस्थानी मं अनुद्वित कहानियों को सुनते हुए भूरी-भूरी प्रशंसा की।
इस अवसर पर राजस्थानी भाषा परामर्श मंडल के संयोजक कवि, नाटककार एवं आलोचक डॉ.अर्जुन देव चारण ने कहा कि अनुवाद दोनों भाषाओं को जोडऩे का माध्यम है, हमं एक-दूसरे को ठीक से पहचानने-समझने का अवसर प्राप्त होता है। डॉ. चारण ने कहा कि विभिन्न भाषाओं एवं संस्कृति को समझने के लिए अनुवाद ही एक मात्र माध्यम है। डॉ. चारण ने कहा कि सम्पूर्ण देश की विभिन्न भाषाओं के लेखक राजस्थानी भाषा में अनुवाद के प्रति उत्साहित है, डॉ. चारण ने राजस्थानी के साहित्याकारों का आह्वान किया वे अन्य भाषाओं से राजस्थानी में अनुवाद कर्म को गंभीरता से लेकर कार्य करें। उन्होंने कहा कि अनुवाद का कार्य करते हुए ऐसा लगता है कि हम उस भाषा की रचना के साथ उस संस्कृति में रमण करने लगते है।
डॉ.चारण ने कहा कि अकादेमी शीघ्र की ओडिया से राजस्थानी अनुवाद की यह पुस्तक प्रकाशित कर पाठकों के सम्मुख प्रस्तुत करेगी।
समापन अवसर पर राजस्थानी अनुवादकों-साहित्यकारों एवं श्री डॉ. सत्यनारायण, चैनसिंह पडिहार, मीठेश निर्मोही, मधु आचार्य ‘आशावादीÓ, राजेन्द्र जोशी, अरविंद सिंह, आशिया, राजेन्द्र बारहठ ने उनके द्वारा की गयी अनूद्वित कहानियों का वाचन किया एवं डॉ.चारण द्वारा बताएं गये संशोधन किए।
कार्यशाला में ओडिय़ा साहित्यकार डॉ.अरविंद राय, बनोज त्रिपाठी ने भी विचार रखे, अंत में दीप्ति प्रकाश मापात्र ने आभार प्रकट किया।

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