
ज्ञान भारती संस्था के सचिव सुरेन्द्र शर्मा एडवोकेट ने बताया कि काव्य विधा अंतर्गत यह पुरस्कार पूर्व में डा. भगवती व्यास, श्याम महर्षि, अम्बिकादत्त आदि को प्रदान किया जा चुका है।
माटी की गंध विश्वमानव तक पहुंचाती कविताएं
निर्णायक समिति के अनुसार पुरस्कृत कृति “पाछो कुण आसी” में विगत से जुड़े रहकर नई चुनौतियों का सामना करने की संभावनाओं को तलाश करती कविताएं है। जो राजस्थानी माटी से जुड़कर विश्व मानवता से अपने भावक को जोड़ती है। पुरस्कार समिति के सचिव जितेंद्र निर्मोही ने बताया कि डा. नीरज दइया राजस्थानी एवं हिन्दी दोनों भाषाओं में समान रूप से विगत तीन दशक से सक्रिय हैं। डा. दइया नये तेवर के राजस्थानी भाषा के समालोचक हैं जिन्हें अनेक पुरस्कार एंव मान-सम्मान प्राप्त हो चुके हैं।
– मोहन थानवी