बीकानेर । 12 दिसम्बर । सादूल राजस्थानी रिसर्च इन्स्टीट्यूट , बीकानेर के तत्वावधान में इटली मूल के राजस्थानी विद्वान डॉ. एल. पी. तैस्सितोरी की 131वीं वर्षगांठ पर दो दिवसीय कार्यक्रम के तहत प्रथम दिन मंगलवार को स्थानीय म्यूजियम परिसर स्थित डॉ. तैस्सितोरी की प्रतिमा पर पुष्पांजली , उनके व्यक्तित्व एवं कृत्तिव्व पर कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता शिक्षाविद् एवं राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी के पूर्व सचिव श्री जानकी नारायण श्रीमाली ने की तथा कार्यक्रम के मुख्य अतिथि वरिष्ठ साहित्यकार बुलाकी शर्मा तथा विशिष्ट अतिथि वरिष्ठ संस्कृतिकर्मी एन.डी.रंगा थे।
कार्यक्रम के प्रारंभ में अतिथियों , सामाजिक कार्यकर्ताओं , शिक्षाविद् , साहित्यकारों एवं शोधार्थियों ने डॉ. तैस्सितोरी की मूर्ति पर माल्यार्पण किया ।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि बुलाकी शर्मा ने कहा कि इटली निवासी विद्वान डॉ. तैस्सितोरी बीकानेर में रहते हुए राजस्थान के इतिहास , संस्कृति , साहित्य तथा पुरातत्व संबंधी शोध कार्य में तत्पर रहे । शर्मा ने कहा कि उन्होनें यहां के ऐतिहासिक साहित्य हस्तलिखित ग्रन्थ , शिलालेख एवं जैन साहित्य को एक सूत्र में पिरो कर साहित्य मर्मज्ञों के लिए प्रस्तुत किया ।
अध्यक्षता करते हुए श्री जानकी नारायण श्रीमाली ने कहा कि डॉ. तैस्सितोरी राजस्थानी लोकगीतों के प्रेमी थे वे मूमल , मरवण , पद्मिनी आदि कथाऐं और गीत सुनते और रात – रात भर गांवों में रहकर वहां की भाषा और संस्कृति का अध्ययन करते रहे । पल्लू गांव की दसवीं-ग्यारवी शताब्दी सरस्वती प्रतिमा को ( 10वी -11वीं शती ) को तलाशने का श्रेय भी डॉ. तैस्सितोरी को ही जाता है ।
मुख्य वक्ता कवि-कथाकार राजेन्द्र जोशी ने कहा कि बीकानेर के भ्रमण और यहां के इतिहास को पढ़ने से स्पष्ट हो गया कि यहां साहित्यक जागरूकता वर्तमान में भी है , और पूर्व में भी रही है ऐसे में बीकानेर की माटी से प्रेरणा लेकर डॉ. तैस्सितोरी ने राजस्थानी भाषा के लिए कार्य किया । जोशी ने कहा कि बीकानेर से लगाव होना अपने आप में किसी घटना से कमतर नहीं है ।
विशिष्ट अतिथि श्री एन.डी.रंगा ने कहा कि डॉ. तैस्सितोरी की राजस्थान की मरूधरा एवं मरूवाणी की संस्कृति एवं साहित्य के प्रति असीम अनुरक्ति थी , यही कारण है कि वे शनैः शनैः यही के होकर रह गये ।
इस अवसर पर वरिष्ठ संगीतज्ञ ड़ॉ. मुरारी शर्मा ने कहा कि अब समय आ गया है , जब राजस्थानी भाषा को मान्यता मिल जानी चाहिए । कवि-कथाकार राजाराम स्वर्णकार ने कहा कि उदीने एवं बीकानेर को जुड़वां शहर के रूप में स्थापित करने के लिए नगर निगम एवं नगर के साहित्यकारों एवं कला साहित्य एवं संस्कृति जगत के लोगो को प्रयास करने की जरूरत है ।
लेखक ड़ॉ. अजय जोशी ने कहा कि शोधार्थियों को डॉ. तैस्सितोरी के शोध कार्य का अध्ययन करना चाहिए और उनके द्वारा किए गये शोध से अपने द्वारा किये जाने वाले शोध को गुणवत्तायुक्त बनाया गबकेजा सकता है । उन्होंने कहा कि डॉ. तैस्सितोरी भाषा के प्रति जुड़ाव के प्रेरणा स्त्रोत के रूप में याद किए जाएगें ।
साहित्यकार ड़ॉ. बसंती हर्ष ने कहा कि इटली निवासी डॉ. तैस्सितोरी राजस्थानी संगीत के भी प्रेमी थे ।
कार्यक्रम में उनके व्यक्तित्व एवं कृत्तित्व पर मुरली मनोहर माथुुर,,महेन्द्र सिंह बडगूजर,,अबीर चंद व्यास,,चन्द्रशेखर जोशी, प्रेम नारायण व्यास,ड़ॉ. एम.एल.व्यास,मधुरिमा सिंह,धनश्याम सिंह ने विचार रखे। आभार युवा कवि जुगल किशोर पुरोहित ने ज्ञापित किया।
ड़ॉ.शर्मा ने बताया कि दूसरे दिन 13 दिसम्बर को तैस्सितौरी अवार्ड अर्पण कार्यक्रम होगा। 13 दिसम्बर बुधवार को प्रातः 11ः30 बजे स्थानीय नेहरू शारदा पीठ(पी.जी.)महाविघालय,जस्सूसर गेट के अन्दर आयोजित होने वाले कार्यक्रम में राजस्थानी भाषा के मुर्धन्य विद्वान वरिष्ठ साहित्यकार श्री भवानी शंकर व्यास’’विनोद’’एवं वरिष्ठ साहित्यकार ड़ॉ. मदन केवलिया को ड़ॉ. एल.पी. तैस्सितौरी अवार्ड अर्पित किया जाएगा। कार्यक्रम संयोजक राजेन्द्र जोशी ने बताया कार्यक्रम के मुख्य अतिथि नगर विधायक ड़ॉ.गोपाल जोशी होंगे। कार्यक्रम की अध्यक्षता राजस्थान राज्य अभिलेखागार के निदेशक ड़ॉ.महेन्द्र खड़गावत करेंगे तथा विशिष्ट अतिथि नगर निगम के महापौर श्री नारायण चौपड़ा होंगे।