जहां खडा था वही खडा है राम रतन

व्यंग्य
चैक का कोट पहना हुआ प्रौढ अपने देश के आम आदमी का प्रतीक है. हालांकि स्व. आर.के लक्षमण ने उस आदमी का नाम, पता, उम्र इत्यादि कभी कुछ भी नही बताया. वैसे भी आम आदमी का क्या नाम ? क्या पता ? उस के नाम से कभी गरीबी हटाओ, कभी सबका साथ, सबका विकास कार्यक्रम चलता है, कभी इंडिया शाईनिंग होजाता है तो कभी समृध्द भारत. कोरोना की वजह से अचानक किए गये लॉकडाउन के फलस्वरूप आम आदमी अपना धन्धा,निवास छोडकर गांव जाने को निकल पडा था. उसे क्या क्या कष्ट नही झेलने पडे ? वरिष्ठ नागरिकों को भारत विभाजन के समय की कुछ यादें हरी होगई.

शिव शंकर गोयल
आम आदमी इस बार न केवल अपने धंधें से उजड गया है बल्कि परिवार एवं छुटपुट सामान सहित अपने घर लौटते वक्त उसने बहुत कष्ट पाया है. कुछ को रास्ते मे टुकडों टुकडें में कोई साधन मिला तो कुछ लाचारी में पैदल ही अपने गांव के लिए निकल पडे. कुछ को ट्रेन में जगह मिली भी तो ट्रेनें ही भटक गई जिसकी झलक, वर्षो पहले फिल्म चलती का नाम गाडी में किशोर दा ने यह गाना गाकर दिखाई थी. जाते थे जापान, पहुंच गए चीन ….
एक घटना में तो मुंबई से लखनऊ जा रही एक ट्रेन में एक महिला ने बिना किसी चिकित्सा सहायता के एक बच्चें को जंम दिया.
खैर, जो भी है आप उस आम आदमी का नाम राम रतन रख सकते है. उसकी स्थिति देखिए

“दलदल में आवक्ष गडा है राम रतन, जहां खडा था वही खडा है राम रतन.
कार्यालय के कर्मकांड की चौखट पर, ढुका ढुका सा, विवश खडा है राम रतन.
सोच समझ कर जिस जेल में डाला था, अब भी वहां का वही पडा है राम रतन.
जितना गया बसाया उसको, उतना ही, उजडा और अधिक उजडा है राम रतन.
शायद कच्चे धागे से सिल रखा था, पूरा का पूरा उधडा है, राम रतन.
पहले ही कश में खांसी दी, फेंक दिया, अध जली बीडी का टुकडा है, राम रतन.
नापो अगर सही फीते से, पाओगे, अपने कद से बहुत बडा है, राम रतन.
जाने क्या कर गुजरे, कुछ भी पता नही, इधर बहुत, उखडा उखडा है, राम रतन.”

(जयपुर से प्रकाशित नई गुदगुदी से साभार)

शिव शंकर गोयल

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