दस दिन में 2 वृद्धा सहित 3 बुजुर्गों के कूल्हों का मित्तल हाॅस्पिटल में हुआ जोड़ प्रत्यारोपण
अस्थि रोग विषेशज्ञ डाॅ दीपक जैन ने किए आॅपरेषन
अजमेर, 31 अगस्त( )। उम्र का षतक लगाने के मुहाने पर खड़े 97 वर्शीय बुजुर्ग ओंकार प्रसाद के कूल्हे का जोड़ मित्तल हाॅस्पिटल के अस्थि रोग विषेशज्ञ डाॅ दीपक जैन ने बदल दिया। डाॅ दीपक जैन ने विगत दस दिनों में कूल्हे के जोड़ प्रत्यारोपण का यह तीसरा बड़ा और उच्च जोखिम वाला आॅपरेषन किया। इससे पहले वे लगभग इतने ही जोखिम भरे दो वृद्ध महिलाआंे के कूल्हे के जोड़ बदल कर उन्हें आॅपरेषन के अगले ही दिन अपने पैरों पर खड़ा कर घर भेज चुके हैं। इनमें एक वृद्धा 88 वर्श की तो दूसरी 75 वर्श की थीं। यह तीनों ही वृद्ध पिछले दिनों अपने घरों पर बाथरूम एवं स्नानघर आते जाते फिसल कर चोटिल हो गए थे। कहने की जरूरत नहीं कि इस उम्र में बुजुर्गों के कूल्हे की हड्डी का टूटना और फिर उसके दर्द को सहते हुए आगे का जीवन जीना कितना पीड़ा दायक होता होगा।
यहां चिंता और चिंतन का विशय यह रहा कि इन तीनों ही बुजुर्गों के परिवारजनों को उनके परिचितों और षुभचिंतकों ने इस उम्र में किसी तरह के आॅपरेषन का जोखिम लेने से अव्वल मना कर दिया था या फिर हतोत्साहित ही किया था। वहीं कोरोना वायरस संक्रमण की तेजी से बढ़ती महामारी के इस दौर में अन्य चिकित्सालयों के चिकित्सकों ने भी रोगी को उपचारित करने से प्रायः हाथ खड़े कर लिए थे।
ऐसे में मित्तल हाॅस्पिटल के अस्थि रोग विषेशज्ञ डाॅ दीपक जैन ने मित्तल हाॅस्पिटल प्रबंधन का विष्वास पाकर यष-अपयष की परवाह किए बगैर इस चुनौती को स्वीकार किया। यहां अह्म बात रही कि कूल्हा जोड़ प्रत्यारोपण के इन तीनों ही मामलों में बुजुर्ग पीड़ितों से अपेक्षित सहयोग की उम्मीद की ही नहीं जा सकती थी। इस उम्र में उनके षरीर का अन्य बीमारियों से ग्रस्त होना अथवा अन्य अंगों का ठीक से कार्य नहीं कर पाना भी साफ दिखाई दे रहा था। चोटिल होने पर एक माह से बिस्तर पर पड़े रहने से उनके कूल्हे की चमड़ी पर घाव होने लगे थे, करवट तक बदल नहीं पा रहे थे, घुटने मुड़ने लगे थे, सीधे लेट भी नहीं सकते थे। अन्य बीमारियों का उपचार भी संभव नहीं हो पा रहा था। बावजूद उनके परिवारजनों की इच्छाषक्ति, धैर्य और होंसला ऐसा था कि उन्होंने ‘‘हर हार के बाद जीत सुनिष्चित’’ होने के षाष्वत सत्य को फिर साकार करवा दिया।
प्राण जाने होंगे तो यूं भी जाएंगे हीः-
97 की इस उम्र में जबकि ओंकार प्रसाद जी सभी काम स्वयं करते थे, भले चंगे चलते फिरते थे, अंत समय में ऐसी पीड़ा दायक अवस्था देखी नहीं जा सकती थी, क्यों कि उम्र कितनी लम्बी है इसका कोई प्रमाण नहीं लेकिन जब तक है वे अच्छे से जियें, कम से कम दर्द से कराहते हुए तो नहीं रहेंगे। और प्राण जाने ही होंगे तो यूं भी चले ही जाएंगे इसलिए उन्होंने आॅपरेषन का जोखिम उठाना मंजूर किया।
– अवधेष कुमार तिवारी, दामाद।
इसमें कोई दोराय नहीं कि बुजुर्गों के आॅपरेषन में जोखिम होता है। एक डाॅक्टर होने के नाते वे इसके लिए संकल्पित भी हैं। उनसे ज्यादा हिम्मत और साहस की जरूरत रोगी के परिवारजनों की होती है। उनकी दर्षाई इच्छा षक्ति से ही वे और उनकी पूरी टीम यह कर सकी। यह पूरा टीम वर्क है, वे अकेले कुछ नहीं, हाॅस्पिटल का ओटी, नर्सिंग, हाउसकीपिंग स्टाफ, उनके साथी कार्डियक, एनेस्थीसियोलाॅजिस्ट डाॅ अनुराग नेल्सन एवं डाॅ राजीव पाण्डे आदि सभी का सामूहिक प्रयास रहा है। बुजुर्ग महिलाओं की अवस्था तो यह थी कि उन्हें हृदयरोग भी था, खून पतला करने की दवाइयां चल रही थीं। इन सभी के कूल्हे के जोड़ बदली कर दूसरे दिन चला दिया गया और तीन दिन में अस्पताल से छुट्टी दे दी गई।
-डाॅ दीपक जैन, अस्थिरोग विषेशज्ञ।
हाॅस्पिटल अपने ध्येय वाक्य ‘आपका स्वास्थ्य संरक्षक’ के साथ पंद्रह वर्शों से संभागवासियों को स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान कर रहा है। यहां एक ही छत के नीचे सभी सुपरस्पेषियलिटी हृदय, कैंसर, गुर्दा, न्यूरो, पथरी, प्रौस्टेट व मूत्र रोग एवं आपातकालीन चिकित्सा सेवा व सुविधाएं चैबीस घंटे उपलब्ध हैं। अत्याधुनिक चिकित्सा उपकरणों एवं नवीन तकनीक से युक्त आॅपरेषन थियेटर तथा दक्ष व अनुभवी चिकित्सकों, नर्सिंग, तकनीकी कार्मिकों की टीम पीड़ितों को चिकित्सा सेवाएं देने में तत्पर हैं।
– मनोज मित्तल, निदेषक मित्तल हाॅस्पिटल।