(5 सितम्बर शिक्षक दिवस के लिए विशेष)
हास्य-व्यंग्य

ना मर्द वैद्य से मिलें
इसके नीचे विज्ञापनदाता के मोबाइल न. लिखे होते है. यह बात आज तक पता नही पडी कि जब वैद्य खुद ही नामर्द है तो वह दूसरे का क्या ईलाज करेगा ? इसके साथ ही सामने की तरफ दूसरी दीवार पर दूसरा विज्ञापन है जिस पर लिखा होता है
अनपढ टीचर से मिलें
यहां भी यही बात. जब टीचर खुद ही अनपढ है तो कोई उससे मिल कर क्या करेगा ?
यह कहानी घर घर की है. जैसे झोला छाप डाक्टर वैसा ही सडक छाप टीचर.एक सडक छाप टीचर ने तो ऑन रोड, सडक पर ही, बोर्ड लगाकर फर्राटेदार अंग्रेजी बोलना-सिखाने के लिए स्कूल खोल दिया है. ऐसे ही टीचर आठवी /दसवी फेल को सीधे ही बी ए /एम ए करवाते है यानि बुलेट ट्रेन की तरह.
ऐसे टीचर से अंग्रेजी सीखकर कई लोगों ने धडल्ले से उसका इस्तैमाल भी करना शुरू कर दिया है. ऐसे ही एक विज्ञापन में मकान किराये पर देने हेतु विज्ञापन है आप भी इसका लुत्फ उठायें.
एक स्थान पर कोई सेमीनार थी. उसका विज्ञापन देखिये
एक बी.टेक चाटवाले ने पकौडों की बजाय चाट भंडार खोल लिया है.
एक अति उत्साहित अंग्रेजी पढे लिखे ने आपके लिए food centr खोला है.
एक अंग्रेजी पढे लिखे बारबर ने सैलून खोलकर children cutting का काम भी शुरू कर दिया है. जिसे देखकर एक बार तो पडौस के थानेदार साहब भी चक्कर खागए. अरे ! मेरे ईलाके में चिल्डरन कटिंग हो रही है ?
और तो और दिल्ली जल बोर्ड भी इसी तरह की इंगलिश से आपकी जल सेवा कर रहा है.
स्पष्ट है कि ऐसी अंग्रेजी से पहले बच्चें फेल हुए फिर मास्टरजी.
आज तक आम जनता उपरोक्त यही सब कुछ देखती-सहती आई है. अब यह उचित होगा कि इस शिक्षक दिवस पर हम सरकार द्वारा प्रस्तावित शिक्षा नीति का अध्यन कर अपने सुझाव देवें और सरकार को भी चाहिए कि विरोधी दलों, शिक्षाविदों सहित सभी संबंधित लोगों से राय लेकर इसमें आवश्यक बदलाव करें और शिक्षा पर जीडीपी का कम से कम पांच से छ: प्रतिशत तक खर्च करें.
शिव शंकर गोयल