जौ व चने की फसल को रोगों से बचाने के लिए करे बीजोपचार

अजमेर, 22 अक्टूबर। जिले में चने एवं जौ की फसल को रोगों से बचाने के लिए बीजोपचार आवश्यक रूप से किया जाना चाहिए।

एटीसी तबीजी फार्म के उप निदेशक श्री ओ.पी. शर्मा ने बताया कि चने की फसल अजमेर, जयपुर जिलों में होती है। चने के लिए लवण व क्षार रहित, जल निकास वाली उपजाऊ भूमि उपयुक्त रहती हैं। चने की फसल अधिकतर बारानी क्षेत्रों में ली जाती हैं। जबकि जौ को विपरीत परिस्थितियों जैसे पछेती बुवाई एवं बारानी स्थिति, कम उर्वरा भूमि, क्षारीय और लवणीय भूमि में भी उगाया जा सकता हैं। फसलों में उत्पादन में बढोतरी के लिए आवश्यक है कि फसलों में रोगों का प्रकोप ना हो। इसके लिए फसलों में बीजोपचार एवं रोग प्रतिरोधक किस्मों का प्रयोग करना चाहिए। जौ व चने की फसल में कई हानिकारक रोगों का प्रकोप होता हैं। जौ व चने की बुवाई का उपयुक्त समय मध्य अक्टुबर से मध्य नवम्बर हैं। जौ व चना को रोगों से बचाने के लिए बीजोपचार एवं रोग प्रतिरोधक किस्मों का कृषि विभाग की सिफारिश के अनुसार प्रयोग करना चाहिए।

उन्होंने बताया कि जौ के अनावृत कण्डवा रोग से बचाव के लिए बीज को 1 ग्राम टेबुकोनाजोल 2 प्रतिशत डी. एस. प्रति किलो बीज या 2 ग्राम कार्बोक्सिन या कार्बोक्सिन+थाइरम (1 ग्राम+1 ग्राम) प्रति किलो की दर से उपचारित कर बोना चाहिए। जौ के आवृत कण्डवा एवं पत्तिधारी रोग से बचाव के लिए बीज को 2.5 ग्राम मैन्कोजेब या 3 ग्राम थाइरम प्रति किलो की दर से उपचारित कर बोवें।

उन्होंने बताया कि जौ का मोल्या रोग वाले खेतों में दो-तीन साल तक जौ व गेहुँ की फसल ना बोकर चना, सरसों, प्याज, सूरजमुखी, मैथी, आलू या गाजर की फसल बोवें। जौ की बुवाई से पूर्व 30 किलो कार्बोफ्यूरॉन 3 प्रतिशत कण प्रति हैक्टेयर की दर से भूमि में ऊर कर बुवाई करें। रोग रोधी किस्म आर.डी. 2052, आर.डी. 2508, आर.डी. 2624, आर.डी. 2035 का प्रयोग करें तथा बीज को 10 मि.ली. नीम गोल्ड या नीम के तेल से प्रति किलो बीज की दर से उपचारित कर बुवाई करें। जौ का पीली रोली रोग से बचाव के लिए रोग रोधी किस्म आर.डी. 2508, आर.डी. 2592, आर.डी. 2624, आर.डी. 2715, आर.डी. 2849 का प्रयोग करें।

उन्होंने बताया कि चने के जड़ गलन अथवा सूखा जड़ गलन रोग गलन रोग के प्रकोप वाले खेतों में टा्रईकोडर्मा से भूमि उपचार करना चाहिए। भूमि उपचार करने के लिए बुवाई से पूर्व 10 किलों टा्रईकोडर्मा को 200 किलों आद्रता युक्त गोबर की खाद में मिला कर 10-15 दिन छाया में रखें तथा इस मिश्रण को बुवाई के समय प्रति हैक्टेयर की दर से पलेवा करते समय मिट्टी में मिला देवें। रोग रोधी किस्म आर.एस.जी. 888 (अनुभव), आर.एस.जी. 895 (अर्पिता), आर.एस.जी. 963 (आधार), आर.एस.जी. 807 (आभार), आर.एस.जी. 945 (आशा), आर.एस.जी. 896 (अर्पण), आर.एस.जी. 902 (अरुणा), आर.एस.जी. 974 (अभिलाषा) तथा मध्यम प्रतिरोधी किस्म सी.एस.जे.डी. 884 (आकाश), सी.एस.जे. 515 का प्रयोग करें तथा बीज को 1 ग्राम कार्बेण्डाजिम एवं थाइरम 2.5 ग्राम या टा्रईकोडर्मा 10 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से उपचारित कर बोना हितकर रहता है।

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