73वें वर्चुअल निरंकारी समागम पर सतगुरु माता सुदीक्षा जी का मानवता को संदेश।
केकड़ी 6 दिसंबर(पवन राठी) मानव भौतिक साधन के पीछे भागने के बजाय मानवीय मूल्यों को अपनाने की ओर ध्यान केंद्रित करेगा तो जीवन स्वयं ही सुंदर बन जाएगा।
केकड़ी ब्रांच मुखी अशोक रंगवानी ने बताया कि उक्त उद्गार सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज ने तीन दिवसीय 73वें वर्चुअल वार्षिक निरंकारी संत समागम के अवसर पर मानवता के नाम पर अपने संदेश में व्यक्त किये,वर्चुअल रूप में आयोजित संत समागम का आनंद है विश्व भर में फैले निरंकारी परिवार के लाखों श्रद्धालु भक्तों एवं प्रभुप्रेमी भक्तों ने मिशन की वेबसाइट एवं संस्कार टीवी के माध्यम से प्राप्त किया।
मीडिया सहायक राम चन्द टहलानी के अनुसार सतगुरु माताजी ने वैश्विक महामारी कोरोनावायरस के संक्रमण के विषय में बताते हुए कहा कि इस नकारात्मक वातावरण में संसार ने यह जाना कि जिस माया के पीछे भाग रहे हैं सही अर्थ में वह भौतिक साधन मात्र है और इनका साधन के रूप में ही उपयोग किया जाना चाहिए। मानव अपने दैनिक कार्य में इतना व्यस्त हो जाता है कि अपने परिवार के लिए भी समय नहीं दे पाता इन सभी भौतिक वस्तुओं के पीछे मनुष्य अपना सुख चैन तक खो देता है इस विकट परिस्थिति में सभी ने यह देखा कि लोग किस प्रकार से स्वार्थ से परमार्थ की दिशा की ओर बढ़ रहे हैं जिसे भी जिस रूप में जरूरत हुई चाहे वह व्यक्तिगत रूप से हो या किसी संस्था के माध्यम से द्वारा उसे उसी रूप में सहायता दी गई इस अभियान में संत निरंकारी मिशन का महत्वपूर्ण योगदान रहा सीमित दायरे में केवल स्वयं के लिए न सोच कर समस्त संसार को अपना माना विश्व बंधुत्व दीवार रहित संसार का उदार चरित्र भाव मन में रखकर हर जरूरतमंद को अपने सामर्थ्य अनुसार सहायता की स्वंय की पीड़ा को भूलकर दूसरों की पीड़ा का निवारण करने का प्रयास किया इन विषम परिस्थितियों में मानवीय मूल्य ही काम आए। लोगों की मदद करके सच्चे अर्थों में मानव मानव कहलाया और यह साबित किया कि मानवता की सेवा ही परम धर्म है।
जोनल इंचार्ज धमन दास के अनुसार सतगुरु माताजी ने कहा कि इस संसार को निरंकार द्वारा सर्वोत्तम उपहार मानवता के रूप में प्राप्त हुआ है प्राचीन काल से ही संतो ने यही समझाया कि इस भौतिक माया को इतना महत्व न दें कि जीवन में इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं है भौतिक साधनों को महत्व न देकर मानवीय मूल्यों को महत्व देना चाहिए जैसे प्रीत प्रेम सेवा नम्रता और इन्हें अपने जीवन में ढ़ालना चाहिए तभी जीवन परिपूर्ण हो सकता है परमार्थ को ही अपना परम लक्ष्य मानकर उनका जीवन उज्जवल कर सकते हैं इसी से ही जीवन में एकत्व का भाव का आगमन होता है और हमारे आचरण और व्यवहार में स्थिरता आ जाती है जब परमात्मा की अनुभूति होती है तब फिर स्थिर से मन का नाता जुड़ जाता है और जीवन सहज व सरल बन जाता है फिर माया रूपी भौतिक वस्तुओं को केवल एक जरूरत समझते हुए उस और अपना ध्यान आकर्षित नहीं करते केवल परमार्थ अर्थात सेवा परोपकार ही जीवन का एकमात्र लक्ष्य बन जाता है।
प्रेस मेंबर इंचार्ज राजकुमारी के अनुसार अंत में माताजी ने श्रद्धालु भक्तों को प्रेरित किया कि परमात्मा के साथ एकत्व का भाव गहरा करते जाएँ जिससे जीवन में स्थिरता प्राप्त हो जिससे दिलों में प्रेम बढ़ता जाएगा और उसी प्रेम के आधार पर हम संसार के साथ एकत्व का भाव स्थापित कर पाएंगे। सदगुरु माताजी ने कहा कि हमें किसी स्वार्थ या मजबूरी के कारण नहीं बल्कि इसलिए प्रेम का मार्ग अपनाना चाहिए क्योंकि केवल वही एक उत्तम मार्ग है स्वार्थ भाव से मुक्त होकर साधनों को साधन मात्र ही समझ कर सच्चाई की और आगे बढ़ते चले जाएं।