दादी मां के नुस्खें

पुराने समय में राजस्थान के दूसरों हिस्सों की ही तरह अजमेर में भी अलग अलग रोगों का शर्तिया घरेलू ईलाज होता था. आइये कुछ रोग और उनके ईलाज को याद करते है.

शिव शंकर गोयल
कमर दर्द :- आजकल इस बीमारी के कई नाम है मसलन कमर दर्द, गरदन दर्द, Slip Disc(कूल्हें का दर्द), Frozen Shoulder(कंधें का दर्द) आदि आदि लेकिन पुराने समय में इसे चणकण के नाम से जाना जाता था. जिसे ठीक करने के लिए घरों की बुजुर्ग महिलाएं मरीज को पेट के बल लिटाकर, धान कूटने के लकडी के मूसल से उसकी रीड की हड्डी के मनियों पर बारी बारी से ऊपर से नीचे और फिर नीचे से ऊपर हल्का वजन डालती और साथ ही साथ निम्न गीत भी गाती जाती जिसे मरीज को साथ साथ दोहराना होता था. आप भी सुनिए :-
चणकण ए !
मणकण ए !
सासू न्यूत्यां !
न्यूत बुलाया, फेर कदी नही आया ! चणकण ए !….
ऐसा सात बार करना होता था और मजे की बात है कि ऐसा करने से ही कुछ दिनों में रीड की हड्डी के गुनिए सीध में आ जाते थे अर्थात दर्द चला जाता था.
बच्चों का दांत दर्द . छोटे छोटें बच्चों के जब दांत निकलते है तो उन्हें दर्द भी होता है और किसी किसी को दस्त वगैरह भी लग जाते है. इसके लिए पनवाडी की दुकान से, पान के पत्तों के बीच पाई जाने वाली, दांताजेडी लाकर उसको एक डोरे में पिरोकर बच्चे के गले में लटका देते थे. यह नुस्खा भी दवा का काम करता था.

जुकाम-बुखार . किसी को सर्दी लगकर जुकाम, बुखार आदि होजाता तो किसी किसी मंदिर के पुजारी या सयाने-भोपा के पास जाकर उसे बताता तो वह अपनी सुविधानुसार निम्न लिखित में से कोई एक उपाय कर देता था .
मोरपंख का झाडा (मोरपंख को सामने बैठे मरीज के ऊपर-नीचे, दांये-बांये घुमाते हुए कोई मंत्र बुदबुदाता जो किसी को भी साफ सुनाई नही देता था).
छुरी का झाडा :- इसके लिए हाथ में एक भौंटी यानि जो तीखी न हो छुरी लेकर उसे पानी में भिंगो भिंगो कर जमीन पर कुछ लकीरें बनाना फिर उन्हें काटता जिससे यह लगे कि आधि(मानसिक रोग) और व्याधि(शारारिक रोग) दोनों कट रही है. इस विधि से आधुनिक डाक्टरों की Second Openion से लेकर थर्मामीटर से Temprature नापना, इन्जैक्शन लगाना या किसी तरह की दवाई आदि लेने का झंझट मिट जाता था.
किसी किसी मरीज का काम भैंरूजी के आगे जलने वाली ज्योति की भभूत को पानी के साथ फांकी लेने से भी चल जाता था.
कोई कोई जानकार जुकाम के लिए सूंघने हेतु सौंठ का पाउडर देते थे जिसे सूंघने से खूब छींकें आती थी और कफ निकल कर दो-तीन रोज में जुकाम ठीक जाता था.

मानसिक बीमारी :- कोई आधि यानि मानसिक बीमारी जो लम्बे अर्से से चल रही हो तो इसके ईलाज के लिए ताबीज को काले डोरे-धागे- से बांधकर या तो मरीज के बाजू पर बांध दिया जाता या उसके गले में लटका दिया जाता था.
डायबिटीज के ईलाज के लिए रात को सोते समय मरीज के तकिये के नीचे फिटकरी रख दी जाती. कहते है कि वह उसी से ठीक हो जाता था.
कृपया अपने अनुभवों से अवगत करायें.

error: Content is protected !!