*बेटियों ⛹️‍♀️को सलाम, देश भी रखे उनका मान*👑

👉 _*ओलंपिक खेलों में भारत की बेटियों ने पदकों 🥇की झड़ी लगाई*_
👉 _*होनहार बेटियों पर पूरा देश 🇮🇳कर रहा है गर्व*_🎉
👉 _*जब बेटियां 🙋🏻‍♀️हर जगह परचम फहरा सकती हैं, तो बेटे क्यों नहीं*_❓

प्रेम आनंदकर
इन दिनों ओलंपिक खेल चल रहे हैं। इनमें हमारे देश की बेटियों ने पदकों की झड़ी लगाकर देश का मान बढ़ाया है। होनहार बेटियों पर पूरा देश गर्व कर रहा है। सबसे पहले मीरा चानू ने पदक भारत की झोली में डालकर इस सिलसिले की शुरूआत की। इसके बाद तो पदकों की लाइन लग गई है। वाकई में बेटियां भी किसी से कम नहीं होती हैं। वह जुमले अब पुरातनपंथी, ढकोसले और पुराने पड़ गए हैं, जिनमें यह कहा जाता था कि ’’नारी तेरी यही कहानी, आंचल में दूध और आंखों में पानी’’, ’’नारी तू अबला है।’’ इस तरह के ना जाने कितने जुमले नारी शक्ति के लिए बताए जाते थे। लेकिन अब नारी ना तो अबला है और ना ही उसकी आंखों में पानी है। हां, नारी वह शक्ति है, जो जिसे भगवान ने जननी का दर्जा दिया है, तो उसके आंचल में दूध होना भी किसी अमृत से कम नहीं है। नारी ने हर जगह और क्षेत्र में अपनी कामयाबी की मिसाल कायम की है। जो नारी किसी जमाने में घर की चारदीवारी के भीतर ही रहती थी और चैके-चूल्हे से लेकर घर के सारे कामकाज तक ही उसका दायरा था, वही नारी अब रोड पर ट्रक चलाने से लेकर आसमान में हवाई जहाज तक उड़ा रही है। यानी नारी देश व समाज के साथ कदमताल करते हुए विकास और सभी क्षेत्रों में सहभागी बन रही है। राज्यों के माध्यमिक शिक्षा बोर्डों और केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की परीक्षाओं के नतीजों को भी देखें, तो बालिकाएं ही बाजी मारती हैं, जबकि बालक पीछे रहते हैं। अनेक प्रतियोगी परीक्षाओं में भी मेरिट में युवतियां आगे रहती हैं। इन सब हालात को देखते हुए अब सवाल यह उठता है कि जब हर क्षेत्र में नारी शक्ति मुकाम हासिल कर रही है, तो बेटे पीछे क्यों हैं। यह ना केवल एक विचारणीय प्रश्न है, बल्कि चिंताजनक स्थिति भी है। अब बात हमारी सरकारों की। भले ही इन खेलों में नारी शक्ति पूरे दमखम के साथ देश का मान बढ़ा रही हैं, लेकिन पुराने अनुभव यही बताते हैं कि अक्सर विभिन्न खेलों में देश का नाम रोशन करने वाले खिलाड़ियों को कालांतर में कोई नहीं पूछता और वे उपेक्षा के शिकार हो जाते हैं। कुछ खिलाड़ियों की तो मुफलिसी में जिंदगी बितानी जैसी कहानियां भी गाहे-बगाहे सामने आ चुकी हैं। इसलिए सरकारों को चाहिए कि वे पदकों से देश की झोली भरने वाले खिलाड़ियों को पुरस्कृत करें, बल्कि उन्हें नौकरी देकर आजीविका चलाने में भी मददगार बने। साथ ही खेलों के लिए पर्याप्त साधन-संसाधन उपलब्ध कराकर खेल प्रतिभाओं को भी आगे आने का अवसर उपलब्ध कराए।

✍️ *प्रेम आनन्दकर, अजमेर।*

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