
प्रत्यूष सिनहा ओर शिवांगी सान्याल। दोनो में प्रेम विवाह हुआ। प्रत्यूष तहसिलदार था ओर शिवांगी प्रोफेसर। पहले परिचय। फिर पहिचान। फिर प्रेमे। .. और प्रेम ने शिवांगी को लाल चूनर पहिना दी। प्रत्यूष ने अपने शादी वाले दुपट्टे को उस लाल चूनर से बांध दिया। उनके आंगन में लोभान, धूप एवं अगर की सुगंध महकने लगी। रोज की सुबह उन दोनो के साथ भजन गाती थी और शाम उनके युवा सपनों में खिलखिलाती थी।
फिर एक दिन दोसतों के बीच विमर्श हो रहा था कि स्त्री क्या चाहती है। शिवांगी ने कह दिया – पत्नी अपने परिवार को गृहस्थाश्रम की तरह रखना चाहती है ; वह चाहती है कि पति-पत्नी, दोनो ही इस गृहस्थाश्रम वाली आचार संहिता का पालन करें। बस, यहीं प्रत्यूष न जाने क्यों बिफर गया। वह बोला कि तुम चुप रहो। तुम कुछ नहीं समझती हो। स्त्री को हम पुरुषों से ज्यादा कोन समझेगा। इतना सुनते ही शिवांगी के अंदर की स्त्री सतब्ध रह गई। अचकचा गई। आहत् हुई। अवाक् रह गई। समझी ही नहीं कि ऐसी प्रताड़ना एक तहसिलदार ने किसी प्रोफेसर को दी है , या पति ने पत्नी की उपेक्षा की है अथवा पुरुष ने स्त्री को बेवजह अपमानित किया है।
उस दिन से प्रत्यूष के पुरुषवादी अहंकार ने शिवांगी की स्त्री पर चोट करना आरम्भ किया। पत्नी आहत। स्त्री व्याकुल। दाम्पत्य विह्वल। पारिवारिक अस्मिता जख्मी। बार बार ऐसा होने लगा। मित्रों, संबंधियों, परिचितों आदि में शिवांगी, प्रोफेसर शिवांगी को प्रत्यूष यानी तहसिलदार पति अर्थात् पुरुष नकारने लगा – चुप रहो ; तुम कुछ नहीं समझती हो …इस कथन की पुनरावृत्ति होती रही।
फिर एक बार दोसतों के बीच ही शिवांगी ने कह दिया – मै कुछ नहीं समझती या तुम मुझे कुछ नहीं समझते हो अथवा तुम्हारा पुरुषवाद स्त्री को समझना ही नहीं चाहता है ? इस प्रश्न का प्रत्यूष ने जवाब नहीं दिया। किसी भी दोस्त ने कुछ नहीं कहा। यह सवाल रामायण काल से ही आज तक अनुत्तरित है। पुरुष की अहंता क्यों स्त्री के सम्मान, वैभव, उन्नति एवं गौरव को नकारती रहती है ? पुरुष आखिर क्यों स्त्री संचेतना के विरुद्ध हो जाता है ?
वह बोलती रही – तुम्हारे अंदर का कुण्ठित पुरुष अपनी ही पत्नी के भीतर वाली स्त्री का सम्ममान पर ठोकर मर कर खुद को सुतुष्ट रखना चाहता है। तुम स्त्री को स्त्री से ज्यादा समझने का दावा करते हुए क्या स्थापित करना चाहते हो ? प्रत्यूष चुप। तहसिलदार चुप। पति चुप। शिवांगी की आग्नेय स्त्री के सामने सब चुप।
इसी तरह कभी सीता ने दोबारा अग्नि परीक्षा की बात पर राम की राजसभा को चुप किया था। द्रौपदी ने स्त्री के प्रति पुरुष के वस्तुवादी नजरिये का विरोध करते हुए कौरवों की राजसभा को निरुत्तर किया था। जोधपुर के राजा मालदेव को उसकी उसकी चारित्रिक दुर्बलता के लिए रानी उमादे ने लज्जित किया था। और उस दिन प्रोफेसर स्त्री शिवांगी ने तहसिलदार पुरुष पति प्रत्यूष को निःशब्द कर दिया था।
दोनो में तलाक हो गया। सपने टूट गए। अपने छूट गए। प्रत्यूष ने पुनर्विवाह कर लिया। शिवांगी अकेली रह जाने का दंश भोगती रही। अकेली युवा परित्यक्ता होने की सामाजिक यातना सहन करती रहीं। पुरुषवादी आँखों की खरोंचों से जख्मी होती रही।ं तदुपरांत भी उसके प्रश्न का आज भी पुरुषवादी समाज के पास कोई उत्तर नहीं है।