केकड़ी 29 नवंबर(पवन राठी)किसी काल्पनिक बात पर तब तक विश्वास नहीं होता जब तक हम साक्षात वह चीज नहीं देखते उसी तरह से प्रभु परमात्मा ईश्वर पर भी हमारा विश्वास तभी परिपक्व हो सकता है जब ब्रह्मज्ञान द्वारा उसे जाना जाता है ईश्वर पर दृढ़ विश्वास रखते हुए जब मनुष्य अपनी जीवन यात्रा भक्ति भाव से युक्त होकर व्यतीत करता है तो वह आनंददायक बन जाती है।
केकड़ी ब्रांच मुखी अशोक रंगवानी के अनुसार यह उद्गार सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज ने वर्चुअल रूप में आयोजित तीन दिवसीय 74 वें वार्षिक निरंकारी संत समागम के दूसरे दिवस के सत्संग समारोह में अपने पावन आशीर्वाद प्रदान करते हुए व्यक्त किए। संत समागम का सीधा प्रसारण मिशन की वेबसाइट तथा साधना टीवी चैनल पर हो रहा है इसका लाभ पूरे विश्व में श्रद्धालु भक्तों एवं प्रभु प्रेमी सज्जनों द्वारा लिया जा रहा है।
सदगुरु माताजी ने प्रतिपादन किया कि एकता विश्वास है तो दूसरी तरफ अंधविश्वास की बात भी सामने आती है अंधविश्वास से भ्रम-भ्रांतियां उत्पन्न होती है, डर पैदा होता है और मन में अहंकार भी प्रवेश करता है। जिससे मन में बुरे ख्याल आते हैं और कलह-क्लेशों का सामना करना पड़ता है ब्रह्मांड की हर वस्तु विश्वास पर टिकी है पर विश्वास ऐसा ना हो कि वास्तविक रूप में कुछ और ही हो और मन में हम कल्पना कोई और दूसरी कर ले आंख बंद करके अथवा असलियत से आंख चुराकर कुछ और करते हैं तो फिर हम उन अंधविश्वासों की ओर बढ़ जाते हैं किसी वस्तु की वास्तविकता और उसका उद्देश्य ना जानते हुए तर्कसंगत ना होते हुए भी उसे करते चले जाना ही अंधविश्वास की जड़ है इससे नकारात्मक भाव मन पर हावी हो जाते हैं।
“”सेवादल रैली””
मीडिया सहायक राम चन्द टहलानी के अनुसार समागम के दूसरे दिन का शुभारंभ एक रंगारंग सेवादल रैली द्वारा हुआ जिसमें देश एवं दूर देशों से आए हुए सेवादल के भाई बहनों ने भाग लिया कि सेवादल रैली में विभिन्न खेल शारीरिक व्यायाम, शारीरिक करतब, फिजीकल फॉरमेशन्स माइम एक्ट के अतिरिक्त मिशन की सिखलाइयों पर आधारित सेवा की प्रेरणा देने वाले गीत एवं लघु नाटिका मर्यादित रूप में प्रस्तुत की गई सेवा दल रैली को अपने आशीर्वाद प्रदान करते हुए सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज ने कहा कि तन मन को स्वस्थ रखकर समर्पित भाव से सेवा करना हर भक्त के लिए जरूरी है भले ही वह सेवादल की वर्दी पहन कर करता हो अथवा बिना वर्दी पहने, हर एक में परमात्मा को देखकर हम घर में ,समाज में ,मानवता के लिए मन में सेवा का भाव रखते हुए जो भी कार्य करते हैं वह एक सेवा का ही रूप है सेवा करते वक्त विवेक और चेतनता कि भी निरंतर आवश्यकता होती है।