सूफी फकीर की डायरी : इश्क और भक्ति करने वाले बेखुदी में पहुंच कर मिट जाते हैं

शिव शर्मा
प्रेम तो ेखुदी में ही होता है ! इष्क तो है ही बेखुदी की अवस्था। भक्ति भी बेखुदी में और सुमिरन भी बेखुदी में। हम लोग न प्रेम करते हैं, न भक्ति और न ही सुमिरन। हम केवल तमाशा खड़ा करते हैं। हम दिखावा करते हैं। हम जलसा करते हैं। हम भक्ति नहीं करते, भक्ति के बहाने उत्सव करते हैं। होश में ही नाचते हैं, होश ही में तालियां पीटते हैं और होश में ही पैसे की वारणी करते हैं। इसीलिए हम लोगों में कोई मीरा नहीं है, मंसूर नहीं है, जुलेखा नहीं है, चैतन्य स्वामी नहीं है, रांझा नहीं है। हमारा दुनियावी प्रेम शादी कर लेता है ओर कथित रूहानी प्रेम रोटी-कपड़ा-मकान- ओलाद से आगे नहीं पहुंचता है।
बेखुदी में पहुंचा मंसूर हल्लाज (सूफी दरवेश) बोला – अनहलक (अहं ब्रह्मास्मि) और कट्टर पंथियों ने उसे मार दिया। बेखुदी में चैतन्य स्वमी लहंगा-ओढनी पहिन कर वाचने लगे, स्त्रियों की मण्डली में बैठ कर कीर्तन करने लगे। बेखुदी में ही भक्त स्वमी हरिदास राधा की सखी ललिता बन कर कृष्ण के प्रेम में डूब गए। युसूफ के इष्क में बेखुदी की हद तक पहुंच गई जुलेखा ने सारी दौलत लुटी दी और उस की रूह फना हो गई । बेखुदी की अवस्था में रैदास ने कठौती में ही गंगा का आह्वान कर लिया।
कृष्ण के प्रति प्रेम ने रानी मीरा को खुदी से ऊपर पहुंचा दिया। सास, देवर, ननद आदि सब उस के दुश्मन हो गए। उसे राज महल छोड़ना पड़ा।
क्ृष्ण-प्रेम में मीरा बेखुद हो गई – खुद अपने ही वश में नहीं रही। साधु संतो ंके साथ सरे आम नाचने लगी। कृष्ण की भक्ति में मीरा बेखुदी की हद पार कर गई – जीने मरने का होश नहीं रहा। दीवानी मीरा द्वारकाधीश की मूर्ति के चरणों में गिर गई। जीव की ज्योति भगवान के विग्रह में समा गई। मीरा मर गई। उसी वक्त समुद्र की एक ऊँची लहर मंदिर में आई और मीरा की देह को ले गई। बेखुदी हद से जब गुजर जाए, कोई भक्ति में यों ही मर जाए।
प्रेम बेखुदी में ही होता है। इष्क तो है ही बेखुदी की अवस्था। भक्ति भी बेखुदी में और सुमिरन भी बेखुदी में। हम लो न प्रेम करते हैं, न भक्ति और न ही सुमिरन। हम क
दुनियावी प्रेम की बात करें तो वहां भी बेखुदी में मिट जाना है – रांझा के लिए हीर मिट गई। प्रेम दीवानी सोहणी कच्चे घड़े पर बैठ कर महिवाल से मिलने चली गई और झेलम में डूब गई । मूमल ने महेंद्र के लिए जहर खा लिया। अनारकली ने सलीम के लिए जान दे दी। अजमेर की राजपूत युवती मोणा अपने प्रेमी मंसूर खान के लिए युद्व करते हुए मर गई । खुद मंसूर भी मर मिटा। यहां जिस्म था ही नहीं। वासना थी ही नहीं। भोग था ही नहीं। केवल बेखुदी थी। केवल रूहानी इश्क था। इश्क और भक्ति करने वाले बेखुदी में पहुंच कर मिट जाते हैं – अद्वेत हो जाते हैं। इसलिए साधना करो तो बेखुदी मे चले जाओ। भक्ति करो तो बेसुध हो जाओ। अध्ययन करो तो वहां भी खुदी से पार हो कर आईंस्टाइन बन जाओ। बेखुदी में किया जाने वाला कर्म ही कृष्ण हो जाता है, शकराचार्य बन जाता है, स्वमी विवेकानंद हो जाता है।

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