
होलिका दहन के लिए एक घंटे एक मिनट का ही मुहूर्त
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17 मार्च को भद्रा दोपहर 1:20 से रात 12:57 बजे तक रहेगी। ऐसे में रात 12:58 रात 2:12 बजे तक होलिका दहन किया जा सकता है। इसके बाद ब्रह्म मुहूर्त शुरू हो जाएगा। वहीं, पूर्णिमा अगले दिन 18 मार्च को दोपहर 12:52 बजे तक रहेगी। ऐसे में उदयातिथि में पूर्णिमा रहने से इसका मान संध्या काल तक रहेगा। दूसरी ओर, प्रतिपदा 19 मार्च को दोपहर 12:13 बजे तक रहेगी।
होलिका के लिए रात्रिकाल जरूरी, होलिका दहन के लिए रात, भद्रा मुक्त और पूर्णिमा तिथि होना जरूरी है। यह संयोग 17 मार्च की रात एक बजे के बाद है। वहीं, 18 मार्च को सुबह उदया में पूर्णिमा मिल रही है, लेकिन रात्रिकाल में प्रतिपदा लग जाएगी। ऐसे में कुछ जगहों पर रंगोत्सव का पर्व 18 मार्च को और वहीं कुछ जगहों पर उदयातिथि में प्रतिपदा का मान लेते हुए 19 मार्च को रंगोत्सव मनाया जाएगा। मथुरा और वृंदावन आदि जगहों पर 19 मार्च को होली खेली जाएगी।
गोबर के कंडों की होलिका श्रेष्ठ
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होलिका दहन के लिए गोबर के कंडों की होलिका श्रेष्ठ रहती है। डामर वाली सड़क पर सीधे होलिका दहन अनुचित है। कच्ची जमीन या चौराहों पर ईंट बिछाकर होलिका दहन करना चाहिए। इससे डामरीकृत सड़क होलिका की गर्मी से खराब नहीं होगी।
होलिका दहन पूजा विधि
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होलिका दहन की तैयारियां कई दिनों पहले से ही शुरू हो जाती है क्योंकि होलिका दहन के लिए कई चीजों की जरूरत पड़ती है। होलिक दहन के लिए लकड़ियों, उपले और अन्य जलने वाली चीजों को एकत्रित किया जाता है और ढक दिया जाता है। इन सभी चीजों को फाल्गुन पूर्णिमा के दिन शुभ मुहूर्त में जला दिया जाता है। होलिका दहन के समय छेद वाले उपले, गेंहू की बालियां और उबटन डाला जाता है। मान्यता है कि ऐसा करने से व्यक्ति को आरोग्य की प्राप्ति होती है और सारी नकारात्मक शक्तियां होलिक दहन में जल जाती हैं। होलिका दहन की राख को माथे पर लगाने की भी परंपरा है।
राजेन्द्र गुप्ता,
ज्योतिषी और हस्तरेखाविद
मो. 9611312076
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