चारण साहित्य में स्वातंत्र्य चेतना व चारण साहित्य प्रकाशन एवं आउवा सत्याग्रह इतिहास पर चर्चा
अजमेर. 12 जून। चारण साहित्य शोध संस्थान अजमेर में प्रतिवर्ष होने वाले वार्षिक समारोह के अन्तर्गत चारण समारोह 2022 राजस्थानी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में जोड़ने की आवश्यकता पर परिचर्चा एवं प्रस्ताव व संगोष्ठी ‘‘चारण साहित्य में स्वातंत्र्य चेतना’’ व चारण साहित्य प्रकाशन एवं आउवा सत्याग्रह इतिहास पर चर्चा की गई।
राजस्थानी भाषा की संवैधानिक मान्यता के सत्र के अध्यक्षीय उद्बोधन में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय नई दिल्ली के उपाध्यक्ष डाॅ अर्जुनदेव चारण ने कहा कि भाषा की योग्यता की दृष्टि से राजस्थानी भाषा में कोई कमी नहीं है परन्तु राजनैतिक इच्छाशक्ति की कमी के कारण राजनैतिक दलों ने प्रदेश की अस्मिता से जुड़े इस मुद्दे को फुटबाल बना रखा है। हर दिन हमारी मातृभाषा राजस्थानी के शब्द मर रहे है उनमें समाहित संस्कृति व संस्कार मर रहे है अगर ये ही हालत रही तो राजस्थान अपनी मातृभाषा खो बैठेगा आनेवाली पीढियाँ तक हम हमारी संस्कृति संस्कार कैसे पहुंचाऐंगे।
राजस्थानी भाषा के आंठवी अनुसूची में शामिल शामिल नहीं होने से प्रदेश की प्रतिभाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ हो रहा है। दूसरे प्रदेश के प्रतिभागी 500 अंक का प्रश्न पत्र अपनी मातृभाषा का लेते है ऐच्छिक विषय के रूप में परन्तु राजस्थानी प्रतियोगी आईएएस परीक्षा में अपनी मातृभाषा राजस्थानी का प्रश्न पत्र नहीं ले सकते है इस कारण हमारी प्रतिभाएँ पिछड़ रही है। प्रदेश से पच्चीस सांसद एक ही दल से दूसरी बार जीताकर भेजे है वो प्रदेश की भाषा राजस्थानी की आवाज एकजुट होकर क्यों नहीं उठा रहे है।
राजस्थानी साहित्यकार डाॅ राजेंद्र बारहठ ने कहा कि राजस्थानी भाषा को भाषण,संचालन,प्रकाशन, प्रचार,व्यापार मिडिया की भाषा बनाने का संकल्प लेकर राजस्थानी भाषा को हर स्तर पर मान्यता हेतु कदम आगे बढा सकते है। राजस्थानी शब्द कोश आनलाईन करके इन सब काम के लिए मार्ग प्रशस्त हो गया है।
इस सत्र में मुख्य वक्ता के रूप में भाषण देते हुए अखिल भारतीय राजस्थानी भाषा मान्यता संघर्ष समिति के संस्थापक श्री लक्ष्मणदान कविया ने कहा कि हिन्दी को राष्ट्रीय भाषा के रूप में स्थापित करने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर के नेतृत्व के कहने पर राजस्थानी भाषा की बलि दी गई। उस मदद के लिए उपकार मानना तो दूर राजस्थानी भाषा की संवैधानिक मान्यता में हर कदम पर बाधाएं पैदा की जाती रही है यह राजस्थानी समाज को समझना होगा। अपनी मातृभाषा के सम्मान की बात को समझ कर आगे बढाना होगा। राजस्थानी राजनीति को प्रदेश के हित में विचार धारा से उपर उठकर राजस्थानी भाषा को संविधान की आंठवी अनुसूची में शामिल करने के लिए एकजुट होकर प्रयास करने चाहिए।
राजस्थानी अकादमी के पूर्व सचिव पृथ्वीराज रतनू ने कहा कि अमरीका व नेपाल में राजस्थानी भाषा को मान्यता है और भारत में मान्यता नहीं है यह दुखद है नेपाल की संसद में सांसद राजस्थानी भाषा में शपथ ले सकता है भारत की संसद में राजस्थानी भाषा हमारे सांसद शपथ नहीं ले सकते है यह प्रदेश की जनता अपमान है।
चारण समारोह का द्वितीय तकनीकी सत्र चारण साहित्य की स्वातंत्र्य-चेतना विषय पर आधारित था, जिसमें विषयोपस्थाओं करते हुए सत्र-संयोजक डॉ. गजादान चारण शक्तिसुत ने कहा कि चारण-साहित्य का मूल स्वर ही स्वातंत्र्य-चेतना है। अन्याय का प्रबल प्रतिकार, उत्कृष्ट का अभिनन्दन एवं निकृष्ट का निन्दन इस साहित्य की मुख्य प्रवृत्तियां रहीं, जो कि मूलतः उत्तरदायित्वबोध को जगाने हेतु संकल्पित हैं। चारणों ने अपने साहित्य के माध्यम से जन-जागृति के साथ ही कर्तत्व विमुख राजाओं को चेतावनी के चाबुक लगाने का काम किया।
मुख्य-वक्ता पद्मश्री सूर्यदेव सिंह बारहठ ने राजस्थानी के आदिकवि चारण द्युमणि से लेकर स्वतंत्रता-प्राप्ति एवं आज दिन तक चारण रचनाकारों की रचनाओं के उदाहरणों सहित यह बताया कि चारण हर काल में स्वातंत्र्य-चेता रहा है। चारण ने न्याय-नीति की बात कहने में कभी चूक नहीं की और इसके विपरीत परिणामों से वो कभी घबराया नहीं। उन्होंने चारण साहित्य के विशद अनुशीलन की आवश्यकता पर बल दिया।
सत्र के विशिष्ट वक्ता प्रोफेसर अंबादान रोहडि़या ने गुजरात के चारण-स्वतंत्रता-सैनानी योद्धाओं के राष्ट्रहितार्थ बलिदान की जानकारी देते हुए कहा कि चारणों ने केवल कलम के माध्यम से ही नहीं वरन तलवार से माध्यम से भी स्वतंत्रता के सपने को साकार करने का उल्लेखनीय कार्य किया है।
विशिष्ट वक्ता प्रोफेसर रूपसिंह बारहठ ने डिंगल साहित्य पर शोध-अनुसंधान की आवश्यकता ओर बल डालते हुए कहा कि चारणा साहित्यकारों एवं शूरवीरों के व्यक्तित्व कृतित्व को वर्तमान परिप्रेक्ष्य में उद्घाटित, प्रकाशित एवं प्रसारित करना जरूरी है। सत्र-अध्यक्ष एवं पूर्व सांसद पुष्पदान गढ़वी ने भारतीय स्वाधीनता संग्राम में चारणों के अवदान को अभूतपूर्व बताते हुए कहा कि चारण तो स्वाभाविक रूप से ही स्वतंत्रता का उपासक, शक्ति का आराधक एवं साहित्य-सृजक रहा है। उन्होंने चारण साहित्य में अध्ययन-अनुशीलन को भारतीय इतिहास को जानने का सबल माध्यम बताया।
विशिष्ट वक्ता डॉ. प्रकाश अमरावत ने स्वाधीनता संग्राम में ठाकुर केसरीसिंह बारहठ, जोरावरसिंह बारहठ एवं प्रतापसिंह बारहठ के बलिदान पर प्रकाश डालने के साथ ही आजादी पूर्व रचित स्वतंत्रत्य-चेतना विषयक चारण साहित्य की संचेतना को उद्घाटित किया। विशिष्ट वक्ता एवं सहायक-आचार्य श्री विष्णु सिंह लखावत ने मेवाड़ महाराणाओं के समक्ष आई विपरीत परिस्थितियां और उनमें चारण यौद्धाओं एवं कवियों द्वारा दिए गए सक्रिय साथ पर बात करते हुए अनेक चारण कवियों के स्वातंत्र्य चेतना विषयक काव्य के प्रासंगिक उदाहरण देते हुए इसे सर्व समाज के लिए अंजसयोग्य बताया।
अंत में साहित्यकार डाॅ गजादान चारण ने अजमेर मांगपत्र प्रस्ताव पढा जिसे सबने अनुमोदन कर पास किया