*असली फसाद की जड़ जुबान*

यदि जुबान काबू में रहे तो ना रिश्ते बिगड़ें, ना सामाजिक माहौल खराब हो

✍️प्रेम आनन्दकर, अजमेर।
👉इंसान जन्म लेने के बाद दो-ढाई साल में बोलना सीख जाता है, लेकिन बोलना क्या है, यह सीखने में उम्र निकाल देता है। कब, कहां, क्या बोलना है, भाषा का स्वरूप कैसा रखना है, हमारी जुबान से किसी की भावनाओं को ठेस तो नहीं लग रही है, प्रदेश, देश और समाज में माहौल खराब तो नहीं हो रहा है, यह इंसान आज तक नहीं सीख पाया है। यही कारण है कि कई बार हम बिना सोचे-समझे ऐसी बातें बोल देते हैं, जिनसे ना केवल पारिवारिक व सामाजिक रिश्ते खराब होते हैं, बल्कि साम्प्रदायिक सौहार्द और भाईचारा भी बिगड़ता है। पिछले कुछ दिनों से देश-प्रदेश में ऐसा ही माहौल देखने को मिल रहा है। चाहे कोई किसी भी धर्म, मजहब, जाति, सम्प्रदाय या वर्ग का हो, बदजुबानी से माहौल बिगड़ रहा है। कुछ राजनीतिक दलों के नेता-कार्यकर्ता अति उत्साह या यूं कहें जोश में होश खो बैठते हैं। जिसके कारण हम माहौल की फसल में बदजुबानी के ऐसे बीज बो देते हैं, जिससे नफरत की उपज के अलावा और कुछ भी हासिल नहीं होता है। सवाल यह है कि आखिर हम धार्मिक और सामाजिक भावनाओं को आहत कर क्या हासिल करना चाहते हैं।

प्रेम आनंदकर
आखिर हमारा मकसद क्या है। हम क्यों हमारी आने वाली पीढ़ी के लिए जहरीली जमीन तैयार कर रहे हैं। यहां बात किसी एक धर्म, पंथ, सम्प्रदाय, जाति-बिरादरी या वर्ग की नहीं है। सभी कौमों को इस बारे में गंभीरता से सोचना होगा। जब हिंदू-मुस्लिम सहित सभी धर्मों, वर्गों और जातियों के लोगों को इस देश में ही रहना है, तो फिर भाईचारे और साम्प्रदायिक सौहार्द के साथ रहें। राजनेता हों या धर्म गुरु, वक्ता हो या प्रवक्ता, सभी को मर्यादित और संयमित भाषा में अपनी बात कहनी चाहिए। आप कितने ही ज्ञानवान-विद्वान हों, यदि आपकी जुबान में मधुरता, सौहार्द और अपनापन नहीं है तो फिर आपकी विद्वता के कोई मायने नहीं हैं। अगर आप संत-महात्मा हैं, धर्मगुरु हैं, ज्ञानी हैं, विद्वान हैं और सभ्य व जागरूक नागरिक हैं, तो सामाजिक समरसता, सौहार्द और भाईचारे की बात कीजिए। कोई भी धर्म और धर्मग्रंथ यह नहीं कहता है कि खून बहाया जाए। कट्टरवाद का इस धर्मनिरपेक्ष देश में कोई स्थान नहीं है। यह देश हमें अपनी बात कहने की आजादी देता है, लेकिन इस बात की आजादी बिल्कुल नहीं है कि हम जो मन में आए बोलें, फिर चाहे उससे माहौल बिगड़ जाए। यह देश बदजुबानी की सजा तो देता ही है, लेकिन किसी को भी कानून अपने हाथ में लेने की इजाजत नहीं देता है। सभी को मिलजुल कर रहने यानी खुली हवा में सांस लेकर जीने की छूट है, तो खून-खराबा करने पर कानून का शिकंजा जिंदगी तबाह करने की ताकत भी रखता है। आप और हम जिंदगी दे सकते हैं, जिंदगी बचा सकते हैं, लेकिन किसी की जिंदगी लेने का हक ना अल्लाह देता है, ना ईश्वर देता है। ना ही कानून इजाजत देता है, ना कोई धर्म या मजहब और ना ही कोई धर्मग्रंथ। जिन लोगों ने जो भी हरकतें की हैं, कानून उन्हें जरूर सजा देगा। और फिर ऊपर वाला तो अपने हिसाब से सजा देता ही है। तो फिर आइए, नफरत के माहौल से उबर कर सद्भावना फैलाएं।

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