बढ़ रहा है तीव्रता से आज-कल ऐसा यह धंधा,
भूल रहा है मान मर्यादा नियम कानून वह बंदा।
तोड़ रहा रिश्ता-नाता हर सामाजिक ये मर्यादा,
सच पूछें तो जिंदा लोगों का ये फांसी का फंदा।।
इस व्यापार मे होते है अनेंको प्रकार के दलाल
जो अपना कमीशन पाकर वह होते मालामाल।
लाते है ग्राहक पटाकर बहलाकर जिनके पास,
कहते जिसे बदनाम बस्ती जो फंसे-रहते जाल।।
किसी की लाचारी मजबूरियों ने झेली यह मार,
कोई भूखमरी-ग़रीबी के कारण हुये है शिकार।
न करों कोई शारीरिक शोषण बदलो ये विचार,
सम्मानित है यह नारी जाति न छीनो अधिकार।।
जिस्म की बोली लगती जहां आते कई सरदार,
नर्क जैसे जीवन हो जाता कई आते खरीददार।
मेरी मानों तो यारों कोई मत करों ऐसा व्यापार,
इस वैश्यावृत्ति के लिए कौन-कौन है ज़िम्मेदार।।
वैश्यावृत्ति है अभिशाप कोई न बनाओं बाजार,
हवस अपनी मिटाने खातिर न सताओ लाचार।
कई लुटते कई ठगते इसमे फैल रखा है संसार,
कोठे कालगर्ल रेडअलर्ट के मिलते है समाचार।।
रचनाकार ✍️
गणपत लाल उदय, अजमेर राजस्थान
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