गणिनी आर्यिका 105 यशस्विनी माताजी न्यास प्रवचन देते हुए कहा कि मनुष्य को शुद्ध भावनाओं को अंगीकार करना चाहिए मन में विचारों की स्वच्छता मानसिक विकास के साथ-साथ व्यवहारिक विकास भी करती है परिणाम तो हम अच्छा पाना चाहते हैं लेकिन उन परिणामों के प्रति हम जागरूक नहीं होते हैं कहीं बार कर्तव्य की राह से हट जाते हैं माताजी ने कहा कि जीवन में सात्विक मूल्यों को अपनाना चाहिए वही जीवन उज्जवल हो पाता है
थोड़ा सा भी परेशान होते हैं और मन भटक जाता है संसार मार्ग को समझना चाहिए कि यहां सुख और दुख दोनों हैं अन्यथा अगर सुख ही सुख हो तो दुख का एहसास कैसे होगा और दुख ही दुख हो जो सुख का एहसास कैसे होगा जीवन सुख और दुख रूपी तराजू के समान है कभी दुख का पलड़ा भारी होता है कभी सुख का
माताजी का प्रवास कार्यक्रम पार्श्वनाथ कॉलोनी वैशाली नगर में हो रहा है प्रतिदिन प्रातः 8:30 बजे हो रहे हैं संध्या काल में आरती हो रही है माताजी की आज की आहार चर्या कैलाश चंद्र निर्मल कुमार अरविंद सेठी परिवार के हुई