याद करें हम बहादुरों की कुर्बानियां

इतना तो करना देश के सेनानियों पर अहसान,
उनसे ही आन बान शान जो छोड़ गए पहचान।
एक दीपक जला देना सभी कुर्बानियों के नाम,
भारत माता के लिए जो दे गऐ है ‌अपनी जान।।

यह‌ बलिदान ना जाऐ यहां किसी का भी व्यर्थ,
दीप जलाकर उतारों उनका देश-प्रेम का क़र्ज़।
रोशन कर दो दीप जलाकर वीरों का सारा घर,
हम भी है भारतवासी निभाएं अपना यह फ़र्ज़।।

अगर याद करें हम उन बहादुरों की कुर्बानियां,
तो हर किसी का भी कंपकंपा उठेगा ये साया।
विजय पताका फहरा दिया स्वयं को मिटाकर,
सर्दी गर्मी बरसात में भी अपना फर्ज निभाया।।

कैसे रहते होंगे अपने‌ पूरे परिवार को छोड़कर,
छोटे छोटे बच्चों व वृद्ध मां-बाप से बिछुडकर।
सुबह शाम दोपहर रात का पता नही है रहता,
वतन सुरक्षित रहे इसलिए पहरा देते जागकर।।

कभी दिल की गहराई से उनके बारे में सोचना,
ऑंसू फिर भी छुपा रही है बहन वह वीरांगना।
मुश्किल है इनके जज़्बातों को पन्ने पे उतारना,
प्यार का वृक्ष लगाकर शहीदों को याद करना।।

सैनिक की कलम
गणपत लाल उदय, अरांई अजमेर राजस्थान
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