
वहां के स्कूल प्रबंधन को अपने बच्चों को संग्रहालय भेजना जरूरी लगा.दुनिया भर में कई अन्य देशों के नागरिक अपनी विरासत संजो कर रखते हैं और उसे व्यवस्थित कर प्रदर्शित भी करते हैं.समूची दुनिया में कई ऐसे देश हैं. जिनकी विरासत और इतिहास इतना समद्ध और गौरवशाली नहीं जितना कि हमारे देश का है लेकिन फिर भी यह देख कर बहुत प्रसन्नता होती है कि उनके पास जो भी है उसको बहुत ही सलीके से संजोकर प्रदर्शित करते हैं. इंग्लैंड में बहुत छोटी-छोटी जगहों पर बहुत थोड़ी सामग्री वाले संग्रहालय भी मैंने देखे ऐसे छोटे -छोटे संग्रहालय भी उस देश की एक अच्छी छवि निर्मित करते हैं. वहां के 80% संग्रहलय तथा बच्चों के लिए बहुत सारी एकटिविटी और शैक्षणिक कार्यक्रम आयोजित करते हैं और उन पर लाखों डॉलर प्रतिवर्ष खर्च करते हैं. मेरा विश्वास है कि हमें केवल न केवल अपनी विरासत को बचाना चाहिए बल्कि उसे अच्छी तरह प्रदर्शित कर अपनी आने वाली पीढ़ियों मे भी गौरव का भाव जाग्रित कर राष्ट्रीय स्वाभिमान की चेतना से सांस्कृतिक मूल्यों की स्थापना एवं राष्ट्रीय गौरव पैदा करते हैं. हमारे देश में अधिक सग्रहालय नहीं है लेकिन उनका विस्तार किया जाना चाहिए.इस दिशा में हम चिंतन क्यों नहीं करते एवं केवल सरकार निर्भर नहीं रहा जा सकता है क्योकी विरासत की हिफाजत केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है बल्कि हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है. जन चेतना से राष्ट्रीय स्वाभिमान जागृत कर हम अपनी संस्कृति और संस्कारों की रक्षा कर सकते हैं.जब सभी लोग मिलजुल कर कार्य करेंगे तभी इस दिशा में सार्थक प्रयास होंगे और विरासत का संरक्षण तथा नई पीढ़ी में उसके गौरव का भाव और राष्ट्रीय स्वाभिमान जागृत होगा.इस दिशा में यह भी विचारणीय है कि केवल संग्रहालय बना देना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि उसके लिए जन रुचि जागृत करना भी आवश्यक है अगर लाखों रुपए का खर्च कर संग्रहालय बना दिया जाए और उसके लिए पर्याप्त मात्रा में दर्शक नहीं हो तब भी वह कोई सार्थक परिणाम नहीं दे सकता है वह इसलिए कि हमारी शिक्षा व्यवस्था में भी संग्रहालय में रुचि की दिशा में कोई पाठ्यक्रम में व्यवस्था नहीं है.विभिन्न संचार माध्यमों के द्वारा भी उसकी महत्ता को उजागर करने में हमारे देश के लोग प्राय उदासीन नजर आते हैं.असल में हमने संग्रहालय के महत्व को समझा ही नहीं है कि हमारी बहुत सारी पूरा साथ होती जा रही है क्लाइमेट चेंज समझाने के लिए भी हो रही है जून महीने में आदिवासियों से जुड़े अभियान चलाया गया प्रदूषण का परिंदों पर क्या असर पड़ रहा है कि कोच्चि स्थित संग्रहालय से चलाने की तैयारी चल रही इन परिस्थितियों में निश्चय ही एक उम्मीद जगाती है जो संग्रहालय में थोड़ा बहुत भी समझा जाता है इस जरूरत इस बात की है कि पूरी ऊर्जा से हम इस काम को आगे बढ़ाएं हम अपने अतीत को जानने के लिए संग्रहालय किताबों के पूरक हैं हमारे देश के जिन शहरों में संग्रहालय हैं वहां स्कूलों व कॉलेजों से विद्यार्थियों को नियमित रूप से वहां भेजना चाहिए.संग्रहालय को भी कॉल करके विद्यालयों के छात्रों को अपने यहां आमंत्रित करना चाहिए जिनके पास किसी तरह की पुरा संपदा है उन्हें इस विरासत के संरक्षण और प्रदर्शन की दिशा में आगे आना चाहिए लेकिन यह प्रयास सिर्फ एक प्रयास भर नहीं रहना चाहिए बल्कि एक जन अभियान इस दिशा में वांछित है जो हमारी समग्र चेतना को जागृत कर विरासत के प्रति जागरूकता पैदा करेगा अगर हमें संस्कृति का संरक्षण करना है तो संग्रहाल्य की महती भूमिका है, संस्कृति तभी सुरक्षित रह पाएगी जब युवा पीढ़ी में संस्कार सुरक्षित होंगे.इस दिशा में सामूहिक प्रयास वांछित है. सरकार तथा निजी क्षेत्र मिलकर इस दिशा में आगे कदम बढ़ाए तभी हमारे देश की समृद्ध विरासत से युवा पीढ़ी मे गौरव का भाव जागृत करते हुए राष्ट्रीय स्वाभिमान और चेतना जागृत की जा सकती है।
आलेख प्रस्तुति
*बी एल सामरा “नीलम “*
सेवानिवृत शाखा प्रबंधक
मंडल कार्यालय अजमेर