गुरुदेव श्री सौम्य दर्शन मुनि जी महारासा ने फरमाया कि धर्म ही व्यक्ति के जीवन का मुख्य आधार है ,मगर व्यक्ति शारीरिक व्यवस्था में उलझा रहकर धर्म को ही गौण कर रहा है, आप अपने शरीर की स्थितियां पर विचार करने का प्रयास करें कि यह शरीर रोगधर्मी है ।आप यह नहीं चाहते हैं कि आपका शरीर अस्वस्थ हो,आपके शरीर में कोई रोग आवे ,लेकिन ना चाहते हुए भी शरीर अस्वस्थ और रोगों से ग्रसित हो जाता है । हमारे यहां बताए जाता है कि इस शरीर में साढ़े तीन करोड़ रोम है और प्रत्येक रोम के मूल में पौने दो रोग छिपे रहते हैं। इस प्रकार साढ़े 5 करोड से भी अधिक रोग इस शरीर में रहते हैं ।जब तक व्यक्ति के पुण्यवाणी का पलड़ा भारी रहता है तब तक यह रोग दबे रहते हैं ।और जब पुण्यवानी कमजोर होती है तब यह अपना प्रकोप दिखाने लगते हैं। इसलिए ग्रंथो में शरीर के लिए कहा गया है कि “शरीरम व्याधि मंदिरम” यानी यह शरीर रोगों का घर है ।
शरीर की दूसरी स्थिति बताई है कि यह शरीर जराधर्मी है ,यानी यह शरीर जरा यानी बुढ़ापे को प्राप्त होने वाला भी होता है। बुढ़ापा जिसमें इंद्रियों की शक्तियां क्षीण होने लग जाती है ,शरीर पर झुर्रियां पड़ जाती है ,आंखों को देखना और कानों में सुनना कम हो जाता है ।जवानी में जितनी शक्ति और सामर्थ्य था उम्र बढ़ने के साथ-साथ और बुढ़ापा आने के साथ वह शक्ति और सामर्थ्य भी कमजोर पड़ जाता है ,बुजुर्ग अवस्था के लिए कहा जाता है “देहली डूंगर भई “यानी अब तो घर की देहली भी डूंगर के समान लगती है ,यानी उसको लांघ पाना भी बुजुर्ग अवस्था में कठिनाई का कार्य होता है ।
शरीर की तीसरी स्थिति है कि यह शरीर मरणधर्मी भी है अर्थात यह शरीर एक न एक दिन अवश्य मृत्यु को प्राप्त होने वाला है। व्यक्ति कितनी भी चालाकी और प्रयास क्यों ना कर ले वह मृत्यु से बच नहीं सकता है। इस जीवन को ज्ञानियों ने पानी के बुलबुले के समान और पते पर पड़ी ओस की बूंद के समान क्षणभंगुर बताया है। अतः जब शरीर की स्थितियां है कि यह रोगधर्मी, जराधर्मी और मरणधर्मी है। तो फिर इस शरीर के पाने को सार्थक कैसे किया जाए, तब परमात्मा ने अनंत करुणा करते हुए फरमाया कि जब तक शरीर में साता और अनुकूलता की स्थितियां है तब तक धर्म कार्य की प्रवृत्ति कर लेनी चाहिए, क्योंकि एक सफल क्रिकेटर या बल्लेबाज वही होता है जो आउट होने से पहले रन बना लेता है, शानदार स्कोर खड़ा कर लेता है .अतः सावधान और सचेत रहकर जब तक शरीर में असाता या अन्य कोई स्थितियां उत्पन्न नहीं हो उससे पहले ज्यादा से ज्यादा धर्ममय जीवन जी लेना चाहिए ,क्योंकि यह धर्म ही हमें संसार सागर से पार लगाने वाला है ।अगर ऐसा प्रयास और पुरुषार्थ हमारा रहा तो यत्र तत्र सर्वत्र आनंद की स्थितियां होगी ।
धर्म सभा को पूज्य श्री विरागदर्शन जी माहारासा ने भी संबोधित किया ।
धर्म सभा का संचालन बलवीर पीपाड़ा ने किया
पदम चंद जैन
*मनीष पाटनी,अजमेर*