*धर्म आराधना में समय मात्र का भी प्रमाद न करें= गुरुदेव श्री सौम्यदर्शन मुनि*

गुरुदेव श्री सौम्यदर्शन मुनि जी महारासा ने उत्तराध्यन सूत्र के अध्ययनों का विवेचन करते हुए फरमाया कि ,आठवे अध्ययन का नाम है कापिलय।जो कपिल के नाम से पड़ा। कपिल को प्रसन्न होकर राजा ने वरदान मांगने को कहा तो लोभ के बढ़ते बढ़ते उसने विचार किया कि राजा का पूरा राज्य ही मांग लेना चाहिए। मगर फिर विचारधारा बदलती है और उसे जाति स्मरण ज्ञान की प्राप्ति हो जाती है। तो वह कहता है कि है राजन अब मुझे कुछ नहीं चाहिए।और उन्होने संयम जीवन ग्रहण किया। एक बार बलभद्र आदि 500 चोरों ने उन्हें घेर कर संगीत सुनाने को कहा तो इस आठवे अध्ययन की 20 गाथाओं को उन्होंने संगीत के रूप में उन चोरों को सुनाया। जिसे सुनकर 500 ही चोरों ने वैराग्य भाव को धारण कर संयम जीवन स्वीकार कर लिया। कपिल मुनि ने भी साधना आराधना द्वारा मुक्ति को प्राप्त किया।
नवमे अध्ययन का नाम नमि प्रवज्या है।इसमें 62 गाथाएं हैं। इसमें नमि राजा की दीक्षा व शकेंद्र महाराज द्वारा पूछे गए प्रश्नों का वर्णन है। प्रतिबुद्ध यानी बोध को प्राप्त करने पर ही व्यक्ति मुनि बन सकता है। नमि राजर्षि प्रत्येक बुद्ध थे। उनके दाह ज्वर की शांति के लिए जब रानियां ने चंदन घिसते घिसते उस समय होने वाली आवाज को रोकने के लिए जब सुहाग के चिन्ह के रूप में एक-एक चूड़ी रखकर सब उतार दी,उस घटना से नमि राजा का चिंतन चला कि जहां एक होता है वही शांति होती है। और उन्होंने वैराग्य को धारण किया। दीक्षा के संकल्प से उनका दाह ज्वर शांत हो गया। वे दीक्षा के लिए जाने लगे तब शकेंद्र महाराज ब्राह्मण का रूप बनाकर उनसे प्रश्न करते हैं।उन प्रश्नों का नमि राजाश्रि सम्यक प्रकार से जवाब देते हैं। नमि राजर्षि संयम ग्रहण करके अपने मुक्ति के लक्ष्य को प्राप्त कर लेते हैं।
दसवे द्रुमपत्रक अध्ययन, इस अध्ययन में भगवान महावीर ने गौतम स्वामी को माध्यम बनाकर हम सबको प्रमाद के त्याग की प्रेरणा प्रदान की है। भगवान ने 36 बार गौतम स्वामी को संबोधित करके कहा है कि है गौतम समय मात्र का भी प्रमाद मत करो।थोड़ा सा प्रमाद भी बहुत हानिकारक होता है। ड्राइवर, तैराक और पर्वतारोही का थोड़ा सा प्रमाद उनकी दुर्घटना का कारण हो सकता है। और साधना में साधक का थोड़ा सा प्रमाद उसे समाधि से दूर कर देता है। इस जीवन की क्षणभंगुरता को बताने के लिए पके हुए पेड़ के पत्ते,वह तृण के ऊपर रही हुई ओस की बूंद का उदाहरण दिया। कि एक हवा का झोंका इन्हें मिट्टी में मिला देता है।उसी प्रकार यह मौत का प्रमाद है जब तक ही हमारा जीवन है। अतः दुर्गति के कारण प्रमाद का त्याग कर सद्गति में ले जाने वाले धर्म का प्रमत भाव से आचरण करना चाहिए।
11वां अध्ययन में बहुश्रुत पूजा इसमें 32 गाथा है जो अपने ज्ञान का धारक व पूजनीय होता है उसे बहुश्रुत कहा जाता है। योग्यता के आधार पर ही बहुश्रुत बना जाता है।जिसमें अध्ययन की ललक हो, सरल हो, सरस आहार का त्यागी जितेंद्र हो, तो वह बहुश्रूत बन सकता है। क्रोध, मान, प्रमाद, रोग और आलस यह बहुश्रुत बनने में बाधक तत्व है। बहुश्रुत को हाथी,घोड़े,सिंह, चक्रवर्ती, इंद्र चंद्र सूर्य व स्वयंभू रमण समुद्र आदि की उपमा से उपमित किया गया है।जितना जितना व्यक्ति में विनय बढ़ता है उतनी उतनी विद्या भी बढ़ती जाती है। ज्ञानवान व्यक्ति कर्मों का क्षय करके मुक्ति का प्राप्त कर लेता है। अतः वितरक वाणी को सुनकर इसे अपने जीवन में उतारने का प्रयास करें।
उत्तराध्यन सूत्र का मूल वाचन पूज्य श्री विरागदर्शन जी महारासा ने किया ।
धर्म सभा का संचालन हंसराज नाबेड़ा ने किया।
पदमचंद जैन

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