
कुछ इसी तरह का प्रसंग हाल ही फिर आया। मेरा भानजा अहमदाबाद में अस्पताल की आईसीयू में गंभीर अस्वस्थता से गुजर रहा था। जीवन खतरे से बाहर नहीं था। उसे देखने व कुषलक्षेम पूछने के लिए मेरी पूर्णतः स्वस्थ बहिन उसके पास गई। बेटे की गंभीर स्थिति को देख कर वे अत्यंत भावुक हो गईं। विचलित हो गईं। कुछ घंटे बाद यकायक उनकी तबियत बिगडने लगी और अचानक साइलेंट हार्ट अटैक से उनकी मृत्यु हो गई। यह एक संयोग ही था कि इधर उनका निधन हुआ और उधर उनके पुत्र की हालत में तेजी से सुधार होने लगा। अब उसे समान्य वार्ड में षिफ्ट कर दिया गया है। वहां मौजूद परिजन की धारणा बनी कि मेरी बहिन ने अपना बचा हुआ जीवन यानि उम्र बेटे को भेंट कर कर दिया। सवाल उठता है कि क्या बहिन का संकल्प प्रकृति से स्वीकार कर लिया? प्रष्न यह भी उत्पन्न होता है कि क्या किसी की उम्र किसी और के शरीर में शिफ्ट हो सकती है? अर्थात कोई अपनी सांसें किसी और को दान में दे सकता है। हमारे यहां ऐसा सुनने को मिलता है कि कई लोग अपनी उम्र किसी प्रियजन को लग जाने की दुआ मांगा करते हैं। समझा यही जाता है कि वह औपचारिक दुआ मात्र होती है। उसके फलित होने को सुनिश्चित नहीं माना जाता। वह मात्र प्रियजन के प्रति दुआगो के अनुराग का द्योतक है। लेकिन ताजा घटना, यदि संयोग नहीं है तो इस बात की पुष्टि करती है कि यदि दुआ सच्चे दिल से की जाए तो वह कबूल भी हो सकती है।