महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय के वैदिक वाङ्मय संकाय द्वारा वेद वेदांग और विकसित भारत” विषय पर हुआ राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन
अजमेर। महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय, अजमेर में वैदिक वाङ्मय विभाग द्वारा आयोजित वेद वेदांग और विकसित भारत” विषय पर आयोजित संगोष्ठी में दिल्ली के प्रख्यात वैज्ञानिक, चिंतक एवं पूर्व वैज्ञानिक सलाहकार -प्रधानमंत्री कार्यालय डॉ. ओम प्रकाश पांडेय (D.Sc. – Consciousness, कोलकाता विश्वविद्यालय; D.Litt. – वैदिक वाङ्गमय में सृष्टि रहस्य, उत्तराखण्ड विश्वविद्यालय) ने “वेद-वेदांग और विकसित भारत” विषय पर विस्तृत एवं अत्यंत प्रभावशाली व्याख्यान प्रस्तुत किया। अपने उद्बोधन में डॉ. पांडेय ने ‘ॐ’ को ब्रह्मांडीय ध्वनि बताते हुए उसकी वैज्ञानिक व्याख्या प्रस्तुत की। उन्होंने कहा कि समस्त सृष्टि कंपन (वाइब्रेशन) और ऊर्जा के सिद्धांत पर आधारित है तथा मानव कान वास्तविक ध्वनि नहीं, बल्कि उसकी आवृत्ति (फ्रीक्वेंसी) को ग्रहण करता है। उन्होंने ‘ॐ’ के उच्चारण की शुद्ध पद्धति पर प्रकाश डालते हुए इसे चेतना के उच्च स्तर से जोड़ने वाला माध्यम बताया। उन्होंने वेदों को भारतीय ज्ञान-विज्ञान, खगोलशास्त्र, जीवविज्ञान तथा चेतना विज्ञान का मूल स्रोत बताते हुए कहा कि प्राचीन ऋषियों ने ध्यान और साधना के माध्यम से ब्रह्मांडीय रहस्यों का प्रत्यक्ष अनुभव किया। उन्होंने वेदों में वर्णित सिद्धांतों को आधुनिक विज्ञान से जोड़ते हुए प्रकाश की गति, ब्रह्मांड की संरचना, गुरुत्वाकर्षण, डीएनए संरचना तथा सृष्टि उत्पत्ति जैसे विषयों पर विस्तार से प्रकाश डाला और कहा कि यह ज्ञान भारतीय परंपरा में सहस्राब्दियों पूर्व विद्यमान था। डॉ. पांडेय ने वेदांगों—शिक्षा (ध्वनि विज्ञान), कल्प (संस्कार एवं अनुष्ठान), व्याकरण (भाषिक संरचना), निरुक्त (शब्दार्थ), छंद (लय एवं मात्राएँ) तथा ज्योतिष (खगोल विज्ञान)—को वेदों की वैज्ञानिक व्याख्या का आधार बताते हुए कहा कि इनकी सहायता से ही वेदों के गूढ़ अर्थ को समझा जा सकता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि वेदों को केवल व्याकरण से नहीं, बल्कि शोधपरक दृष्टिकोण एवं अनुभवजन्य ज्ञान (ऋषि-दृष्टि) से समझना आवश्यक है। अपने व्याख्यान में उन्होंने भारतीय परंपरा की वैज्ञानिकता को रेखांकित करते हुए कहा कि आज के कई आधुनिक वैज्ञानिक सिद्धांत—जैसे ब्रह्मांड की उत्पत्ति (बिग बैंग), बहु-गैलेक्सी संरचना, प्रकाश के स्पेक्ट्रम, तथा जैविक संरचनाओं के सिद्धांत—प्राचीन वैदिक साहित्य में संकेत रूप में विद्यमान हैं। उन्होंने यह भी कहा कि विज्ञान में भी अंधविश्वास की प्रवृत्ति हो सकती है, अतः प्रत्येक तथ्य को तर्क और परीक्षण के आधार पर परखना चाहिए।
विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए डॉ. पांडेय ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति अद्वितीय है और उसे किसी का अनुकरण करने के बजाय स्वयं का नेतृत्व विकसित करना चाहिए। उन्होंने मन, बुद्धि, अहंकार और चित्त को मानव जीवन के “आंतरिक सॉफ्टवेयर” के रूप में समझाते हुए चेतना (Consciousness) के उच्च स्तर—प्रज्ञान—तक पहुंचने की आवश्यकता पर बल दिया। साथ ही उन्होंने पंचकोश (अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय एवं आनंदमय) के माध्यम से समग्र व्यक्तित्व विकास की अवधारणा को भी सरल भाषा में समझाया। उन्होंने विद्यार्थियों से आह्वान किया कि वे केवल डिग्री प्राप्त करने तक सीमित न रहें, बल्कि शोध, चिंतन और आत्मअनुशासन के माध्यम से अपने भीतर की क्षमता को विकसित करें। उन्होंने कहा कि विकसित भारत का निर्माण तभी संभव है जब विज्ञान और आध्यात्म का संतुलित समन्वय स्थापित किया जाए। डॉ पांडे ने कहा कि किसी महान व्यक्ति के लिए विशेषणों की आवश्यकता नहीं होती, जैसे सूर्य को अपनी रोशनी सिद्ध करने की जरूरत नहीं होती। उन्होंने “I read, I forget; I experience, I understand” के सूत्र के माध्यम से यह स्पष्ट किया कि केवल पढ़ने से नहीं, बल्कि अनुभव से ही वास्तविक समझ विकसित होती है। उन्होंने वर्तमान बाजारोन्मुख (market-oriented) शिक्षा प्रणाली की तुलना रेशम के कीड़े से की, जो अपना ही जाल बुनकर उसमें फंस जाता है। उसी प्रकार आज की शिक्षा व्यवस्था भी एक जाल बन गई है, जिसमें अधिकांश लोग उलझ जाते हैं और अपनी वास्तविक क्षमता को विकसित नहीं कर पाते। उन्होने उदाहरण देते हुए कहा कि बहुत कम लोग ही इस जाल से बाहर निकल पाते हैं, और वही आगे बढ़कर “तितली” की तरह स्वतंत्र और सफल बनते हैं।
इस अवसर पर मुख्य अतिथि राजस्थान विधानसभा के माननीय अध्यक्ष वासुदेव देवनानी ने अपने उद्बोधन में कहा कि विकसित भारत केवल भौतिक प्रगति का प्रतीक नहीं, बल्कि संस्कार, एकता, आध्यात्मिकता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के समन्वय से ही संभव है। उन्होंने भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा, वेदों एवं ऋषि-मुनियों के वैज्ञानिक चिंतन का उल्लेख करते हुए इसे आधुनिक विज्ञान से जोड़ने की आवश्यकता बताई। उन्होंने कहा कि भारत सदैव ज्ञान का केंद्र रहा है और अब समय है आत्मविश्वास के साथ अपनी बौद्धिक परंपरा को पुनः स्थापित करने का। शिक्षा को व्यक्ति निर्माण का आधार बताते हुए उन्होंने नैतिकता, सामाजिक संवेदनशीलता एवं राष्ट्रभावना के विकास पर बल दिया। श्री देवनानी ने कहा कि भारत का समग्र विकास भौतिक, आध्यात्मिक और नैतिक तीनों आयामों पर आधारित होना चाहिए तथा युवाओं को वेदांत के मूल्यों को अपनाकर आत्मनिर्भर एवं संस्कारित भारत के निर्माण में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए।
विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. सुरेश कुमार अग्रवाल ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि वेद और वेदांग किसी एक विचारधारा तक सीमित नहीं, बल्कि “जीवन में प्रयुक्त होने वाली क्रियाशील बुद्धि (Wisdom in Action)” हैं। उन्होंने कहा कि इनका अध्ययन केवल परंपरा का निर्वाह नहीं, बल्कि आधुनिक भारत के निर्माण की बुनियादी आवश्यकता है। कुलगुरु ने कहा कि प्राचीन भारत में वेद-वेदांग शिक्षा का अभिन्न हिस्सा थे, किंतु औपनिवेशिक प्रभाव और पाश्चात्य ज्ञान के अंधानुकरण के कारण हमारी ज्ञान परंपरा उपेक्षित होती गई। उन्होंने शिक्षकों और विद्यार्थियों से आह्वान किया कि वे इस उपेक्षा के कारणों को समझते हुए भारतीय ज्ञान प्रणाली को पुनः स्थापित करने का प्रयास करें। उन्होंने शिक्षा में अंतःविषय (Interdisciplinary), बहुविषय (Multidisciplinary) और अंतर्विषय (Transdisciplinary) दृष्टिकोण को अपनाने की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा मूलतः समग्र (Holistic) रही है, जहां शास्त्र और शस्त्र, ज्ञान और कौशल दोनों का समन्वय होता था। विकसित भारत की अवधारणा पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि यह केवल आर्थिक प्रगति नहीं, बल्कि समावेशी, शिक्षित, स्वस्थ, सुरक्षित एवं सतत भारत की परिकल्पना है। इसके लिए “कल्पना (Envision), सक्षम बनाना (Enable) और क्रियान्वयन (Enact)” — इन तीन चरणों पर कार्य करना आवश्यक है। कुलगुरु ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी भी नीति या विचार को केवल थोपने से नहीं, बल्कि उसे आत्मसात (Internalize) करने से ही वास्तविक परिवर्तन संभव है। इसके लिए शिक्षण में शिक्षार्थी-केंद्रित (Learner-centric) दृष्टिकोण और अनुभवात्मक अधिगम को अपनाना होगा। उन्होंने कहा कि कोई भी राष्ट्र अपनी जड़ों से कटकर विकसित नहीं हो सकता। भारत की पहचान उसकी ज्ञान-प्रधान और धर्म-आधारित सभ्यता में निहित है, जिसे समझकर ही हम वैश्विक स्तर पर सशक्त राष्ट्र का निर्माण कर सकते हैं।
इससे पूर्व विषय प्रवर्तन वैदिक वाङ्मय विभाग के संकायाध्यक्ष प्रोफेसर सुभाष चंद्र द्वारा किया गया। कार्यक्रम का संचालन अंजू अग्रवाल ने किया। आभार ज्ञापन कुलसचिव कैलाश चन्द्र शर्मा ने किया | इस अवसर पर सीआरपीएफ से श्री सुरेश कुमार तथा कोलकाता से पधारे ज्योतिषाचार्य श्री राकेश पांडे की विशेष उपस्थिति रही। कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के समस्त शिक्षकगण, अधिकारीगण, विद्यार्थी एवं शोधार्थी उपस्थित रहे।