*कॉकरोच पार्टी ;-व्यंग्य विधा की जीत*

रासबिहारी गौड

कॉकरोच ..कॉकरोच.. कॉकरोच… सोशल मीडिया की सीलन पर इस कदर फैले हुए है गोया हम  किसी मलबे के ढेर पर खड़े हैं और कॉकरोच हमारे दिमाग में चढ़ गए हैं ..।

      जबकि सोशल मीडिया से उठे इस तकनीकी गुबार की बहुत दिनों तक बने रहने की संभावना बहुत कम है। बावजूद इसके सत्ता  की बेचैनी देखकर लगताहै कि  कॉकरोच उनके शौचालय से निकल कर बेडरुम के बिस्तर पर बिछ गए हो। और दूसरी ओर विपक्ष मानसिकता उनसे ऐसे खुश हो रही है, मानो कीचड़ में अब कमल की जगह कॉकरोच उग आए हो।
      दोनों ओर ही अतिरंजना है। क्योंकि इस सदी का समूचा विवेक राजनीतिक दलों की संपति बन चुका है। इसे युवा वर्ग या जेन जी के आक्रोश की अभिव्यक्ति कहना जल्दबाजी होगी ।मुझे यह सब दूध के उफान से अधिक नहीं लगता। क्योंकि जिस देश की विदेश नीति एक टॉफी से निर्धारित होती हो या  किसी प्रधान को चुनने की वजह उसके हाथ में डमरू और त्रिशूल होता हो, वहां  वैचारिक क्रांति के लिए उतना ही स्पेस होता है जितना कि युद्ध के कोलाहल में शांति की गुहार का। वैसे भी राष्ट्रवाद और धार्मिक उन्माद के सामने किसी आंदोलन के टिकने की  गुंजाइश उतनी ही है, जितनी तोप- तमंचों के सामने तीर-कमान से प्रहार की हो सकती है।
    हां, यह जरूर है कि इस कॉकरोच जनता पार्टी ने सिद्ध किया है कि बड़े से बड़ा अहंकार ,अज्ञान या आत्म मुग्धता, हास्य व्यंग्य के सामने निर्वस्त्र हो जाती है। दूसरे शब्दों में कोई भी सत्ता या तानाशाह गांधी या चार्ली चैपलिन से ही डर सकता है।
     आज  गांधी के होने की संभावना लगभग नगण्य है। लेकिन कॉकरोच पार्टी के स्वर में चैपलिन के वंशज की आवाज सुनाई दे रही है। जिन्होंने सत्ता के गलियारों  में छोटी ही सही एक तिलमिलाहट तो पैदा की। वैसे भी वरुण ग्रोवर,राजीव निगम से लेकर श्याम रंगीला तक स्टैंड अप कॉमेडी टुकड़ों-  टुकड़ों में यह काम कर ही रही है।
     मैं स्वयं हास्य-व्यंग्य का विद्यार्थी रहा हूं तो मुझे निजी रूप से यह उस विधा की जीत लगती है, जो परसाई , शरद जोशी , श्रीलाल शुक्ल, लतीफ घोंघी, ने अपनी कलम से सींच कर मेरी पीढ़ी को सौंपी थी।
*रास बिहारी गौड़*
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