हिंद-प्रशांत में भारत का बढ़ता सामर्थ्य एवं साझेदारियां

भारत आज केवल विश्व की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक शक्ति ही नहीं, बल्कि एक उभरती हुई वैश्विक महाशक्ति के रूप में अपनी नई पहचान स्थापित कर रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत की विदेश नीति ने जिस आत्मविश्वास, स्पष्टता और दूरदृष्टि का परिचय दिया है, उसने अंतरराष्ट्रीय राजनीति की दिशा बदल दी है। कभी जो भारत अपनी रक्षा आवश्यकताओं के लिए विदेशी हथियारों पर निर्भर था, वही भारत आज आधुनिक मिसाइलों, रक्षा प्रणालियों और सैन्य उपकरणों का निर्यात करने वाला विश्वसनीय राष्ट्र बन चुका है। यह परिवर्तन केवल आर्थिक उपलब्धि नहीं, बल्कि भारत की रणनीतिक, वैज्ञानिक, सैन्य और कूटनीतिक शक्ति का भी प्रमाण है। हाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इंडोनेशिया सहित हिंद-प्रशांत क्षेत्र के देशों के साथ हुई उच्चस्तरीय वार्ताएं इस नई विदेश नीति की सफलता का सशक्त उदाहरण हैं। रक्षा, समुद्री सुरक्षा, व्यापार, तकनीक और रणनीतिक सहयोग के क्षेत्रों में हुए समझौते यह स्पष्ट करते हैं कि भारत अब केवल क्षेत्रीय शक्ति नहीं, बल्कि वैश्विक स्थिरता और सुरक्षा का महत्वपूर्ण स्तंभ बन चुका है।
भारत की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता है। वर्षों तक भारत दुनिया का सबसे बड़ा हथियार आयातक माना जाता था, लेकिन आज स्थिति पूरी तरह बदल रही है। ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान ने रक्षा उत्पादन को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया है। ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल, अस्त्र एयर-टू-एयर मिसाइल, आकाश वायु रक्षा प्रणाली, पिनाका रॉकेट सिस्टम, तेजस लड़ाकू विमान और अत्याधुनिक रक्षा उपकरण आज विश्व के अनेक देशों का विश्वास जीत रहे हैं। भारत की स्वदेशी अस्त्र मिसाइल और ब्रह्मोस मिसाइल आज केवल भारतीय सेना की शक्ति का प्रतीक नहीं हैं, बल्कि विश्व के अनेक देशों की सुरक्षा आवश्यकताओं की पूर्ति का माध्यम भी बन रही हैं। पाकिस्तान के विरुद्ध आतंकवाद विरोधी अभियानों में इन हथियारों की प्रभावशीलता ने विश्व का ध्यान आकर्षित किया है। यही कारण है कि इंडोनेशिया जैसे महत्वपूर्ण देश अपने सुखोई लड़ाकू विमानों के लिए अस्त्र मिसाइल प्राप्त करना चाहते हैं तथा ब्रह्मोस मिसाइल प्रणाली खरीदने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। यह भारत के रक्षा उद्योग के प्रति बढ़ते वैश्विक विश्वास का प्रमाण है।
इंडोनेशिया हिंद-प्रशांत क्षेत्र का अत्यंत महत्वपूर्ण देश है। मलक्का जलडमरूमध्य जैसे विश्व के सबसे व्यस्त समुद्री मार्ग पर उसकी रणनीतिक स्थिति वैश्विक व्यापार के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण है। भारत और इंडोनेशिया के बीच बढ़ता रक्षा सहयोग केवल दो देशों के संबंधों को मजबूत नहीं करता, बल्कि पूरे हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शक्ति संतुलन को भी नया आयाम देता है। समुद्री सुरक्षा, आतंकवाद विरोध, रक्षा तकनीक, साइबर सुरक्षा और संयुक्त सैन्य अभ्यासों के माध्यम से दोनों देशों का सहयोग क्षेत्रीय स्थिरता को मजबूत करेगा। प्रधानमंत्री मोदी की विदेश नीति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि भारत अब किसी पर निर्भर होकर नहीं, बल्कि समान साझेदारी और परस्पर सम्मान के आधार पर संबंध स्थापित कर रहा है। भारत किसी देश पर अपनी शक्ति थोपने में विश्वास नहीं रखता। उसकी विदेश नीति का मूल मंत्र है-‘वसुधैव कुटुम्बकम्’, ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास’ और ‘विश्व बंधुत्व’। यही कारण है कि भारत जहां अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और यूरोप के साथ रणनीतिक संबंध मजबूत कर रहा है, वहीं दक्षिण-पूर्व एशिया, अफ्रीका, पश्चिम एशिया और वैश्विक दक्षिण के देशों के साथ भी विश्वासपूर्ण साझेदारी विकसित कर रहा है।
आज हिंद-प्रशांत क्षेत्र विश्व राजनीति का केंद्र बन चुका है। चीन का विस्तारवादी रवैया, दक्षिण चीन सागर में उसका सैन्यीकरण, छोटे देशों पर दबाव बनाने की नीति तथा आर्थिक प्रभुत्व स्थापित करने के प्रयास विश्व समुदाय के लिए चिंता का विषय बने हुए हैं। भारत ने इन परिस्थितियों में संतुलित, शांतिपूर्ण लेकिन दृढ़ रणनीति अपनाई है। भारत किसी के विरुद्ध युद्ध नहीं चाहता, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता से कोई समझौता भी नहीं करता। यही संतुलित दृष्टिकोण भारत को विश्व का विश्वसनीय साझेदार बनाता है। भारत की बढ़ती रक्षा क्षमता चीन और पाकिस्तान जैसे देशों के लिए स्पष्ट संदेश है कि नया भारत अपनी संप्रभुता और राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने में पूरी तरह सक्षम है। भारत अब केवल सीमाओं की सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि समुद्री सुरक्षा, अंतरिक्ष सुरक्षा, साइबर सुरक्षा और आधुनिक तकनीकी युद्ध की तैयारियों में भी तेजी से आगे बढ़ रहा है। स्वदेशी रक्षा उत्पादन इस दिशा में भारत की सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरा है।
प्रधानमंत्री मोदी की विदेश यात्राओं की सबसे बड़ी सफलता यह रही है कि उन्होंने भारत की वैश्विक छवि को अभूतपूर्व ऊंचाई प्रदान की है। आज विश्व के बड़े राष्ट्र भारत को केवल विशाल बाजार के रूप में नहीं, बल्कि विश्वसनीय मित्र, तकनीकी साझेदार, निवेश गंतव्य और सुरक्षा सहयोगी के रूप में देख रहे हैं। जी-20 की सफल अध्यक्षता, क्वाड की सक्रिय भूमिका, इंडो-पैसिफिक सहयोग, वैश्विक दक्षिण की आवाज तथा जलवायु परिवर्तन, डिजिटल अर्थव्यवस्था और आपदा प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में भारत का नेतृत्व इसकी पुष्टि करता है। भारत की विदेश नीति अब केवल कूटनीतिक दस्तावेज नहीं रही, बल्कि राष्ट्रीय विकास का सशक्त माध्यम बन चुकी है। रक्षा निर्यात बढ़ने से विदेशी मुद्रा अर्जित हो रही है, लाखों युवाओं के लिए रोजगार के अवसर सृजित हो रहे हैं, अनुसंधान एवं नवाचार को नई गति मिल रही है और भारतीय उद्योग वैश्विक प्रतिस्पर्धा में मजबूत हो रहे हैं। यह विकसित भारत के निर्माण की दिशा में अत्यंत महत्वपूर्ण कदम है।
भारत की विदेश नीति का मूल मंत्र सदैव शांति, सह-अस्तित्व और परस्पर सम्मान रहा है। आदर्श स्थिति में किसी भी दो देशों के बीच रणनीतिक साझेदारी की नींव किसी तीसरे देश के प्रति वैमनस्य या शत्रुता पर नहीं, बल्कि साझा विकास, सुरक्षा और स्थिरता पर आधारित होनी चाहिए। किंतु अंतरराष्ट्रीय राजनीति आदर्शों से नहीं, बल्कि राष्ट्रीय हितों और शक्ति-संतुलन से संचालित होती है। आज चीन और पाकिस्तान अपने सैन्य एवं आर्थिक गठजोड़ को सऊदी अरब तक विस्तार देने के प्रयासों में जुटे हैं। हाल के सप्ताहों में सऊदी नेतृत्व और बीजिंग के बीच बढ़ती सक्रियता इस बदलते भू-राजनीतिक समीकरण का संकेत है। यद्यपि सऊदी अरब की प्राथमिक सुरक्षा चिंताएं पाकिस्तान और चीन से अलग हैं तथा उसका प्रमुख ध्यान खाड़ी क्षेत्र में ईरान के बढ़ते प्रभाव पर केंद्रित है, फिर भी बदलते वैश्विक समीकरण भारत के लिए सतर्क रहने का संदेश देते हैं। पाकिस्तान हर परिस्थिति में भारत के विरुद्ध रणनीतिक लाभ उठाने का अवसर तलाशता है, जबकि चीन अपने विस्तारवादी दृष्टिकोण के माध्यम से क्षेत्रीय संतुलन को प्रभावित करने का प्रयास करता है। ऐसे समय में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दूरदर्शी, संतुलित और सक्रिय विदेश नीति भारत के हितों की प्रभावी सुरक्षा करती दिखाई देती है। उनकी कूटनीति केवल मित्र देशों के साथ विश्वास बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि चीन और पाकिस्तान की शरारतों, षड्यंत्रों तथा सामरिक चुनौतियों का संयमित और दृढ़ता से सामना करने की क्षमता भी प्रदर्शित करती है। यही दूरगामी सोच भारत को एक विश्वसनीय, जिम्मेदार और प्रभावशाली वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित कर रही है।
आज विश्व एक ऐसे नेतृत्व की तलाश में है जो शक्ति और शांति, विकास और सुरक्षा, तकनीक और मानवता के बीच संतुलन स्थापित कर सके। भारत इस भूमिका को सफलतापूर्वक निभाने की क्षमता रखता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने यह सिद्ध किया है कि सशक्त राष्ट्र वही होता है जो अपनी रक्षा करने में सक्षम होने के साथ-साथ विश्व शांति और मानव कल्याण का भी वाहक बने। निस्संदेह भारत अब विस्तारवाद का नहीं, विकासवाद का प्रतीक है। वह हथियारों का निर्माण युद्ध भड़काने के लिए नहीं, बल्कि शांति की रक्षा और संतुलन स्थापित करने के लिए कर रहा है। यही भारत की सांस्कृतिक चेतना, लोकतांत्रिक मूल्यों और जिम्मेदार वैश्विक नेतृत्व की पहचान है। आने वाले वर्षों में भारत की यही संतुलित विदेश नीति, आत्मनिर्भर रक्षा शक्ति और विश्वसनीय कूटनीतिक नेतृत्व न केवल विकसित भारत के स्वप्न को साकार करेगा, बल्कि विश्व व्यवस्था को भी अधिक सुरक्षित, संतुलित और न्यायपूर्ण दिशा प्रदान करेगा।
प्रेषकः
(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार एवं स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कुंज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज
दिल्ली-110092, मो. 9811051133

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