कानून का राज तभी सार्थक है, जब न्याय सबके लिए समान हो

क्या ऐसी कार्रवाई हर दोषी पर होगी, चाहे वह गरीब हो या अमीर?

rajesh tandon

अजमेर में गैंगरेप एवं मानव तस्करी जैसे जघन्य अपराधों से जुड़े आरोपियों के विरुद्ध प्रशासन द्वारा की गई कठोर कार्रवाई समाज में यह स्पष्ट संदेश देती है कि महिलाओं की अस्मिता, सुरक्षा और सम्मान से खिलवाड़ करने वालों के लिए किसी भी प्रकार की नरमी का स्थान नहीं होना चाहिए। ऐसे अपराध केवल कानून का उल्लंघन नहीं, बल्कि मानवता और सभ्य समाज के मूल्यों पर भी सीधा आघात हैं। ऐसे मामलों में दोषियों के विरुद्ध कठोरतम कानूनी कार्रवाई होना न्याय की स्वाभाविक अपेक्षा है और समाज भी यही चाहता है।
किन्तु, एक वरिष्ठ अधिवक्ता होने के नाते मेरा यह भी स्पष्ट मत है कि किसी भी प्रशासनिक कार्रवाई की वास्तविक कसौटी उसकी निष्पक्षता, समानता, पारदर्शिता और संवैधानिक वैधता होती है। न्याय केवल होना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह भी दिखाई देना चाहिए कि न्याय बिना किसी भेदभाव के किया गया है। यही लोकतंत्र की आत्मा और संविधान की मूल भावना है।
आज समाज के मन में कुछ महत्वपूर्ण और स्वाभाविक प्रश्न उठना भी आवश्यक है
● क्या ऐसी कठोर कार्रवाई प्रत्येक दोषी के विरुद्ध समान रूप से की जाएगी?
● क्या कानून गरीब और अमीर, दोनों के लिए एक समान रहेगा?
● क्या प्रभावशाली, रसूखदार एवं राजनीतिक संरक्षण प्राप्त व्यक्तियों के विरुद्ध भी इसी प्रकार की कठोर कार्रवाई होगी?
● क्या प्रशासन प्रत्येक मामले में समान मानक अपनाते हुए बिना किसी भेदभाव के कार्रवाई करेगा?
● क्या संविधान के अनुच्छेद 14 में निहित ष्कानून के समक्ष समानताष् का सिद्धांत प्रत्येक प्रकरण में समान रूप से लागू होगा?
भारतीय संविधान का आधार समानता, न्याय और विधि का शासन (त्नसम व िस्ंू) है। संविधान का अनुच्छेद 14 प्रत्येक नागरिक को कानून के समक्ष समानता तथा कानून के समान संरक्षण का अधिकार प्रदान करता है। इसलिए किसी भी व्यक्ति के विरुद्ध कार्रवाई उसकी आर्थिक स्थिति, सामाजिक हैसियत, राजनीतिक प्रभाव या पहचान के आधार पर नहीं, बल्कि केवल उपलब्ध साक्ष्यों, विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया और न्यायिक सिद्धांतों के अनुरूप ही होनी चाहिए।
हम अपराधियों के विरुद्ध कठोरतम कार्रवाई के पूर्ण पक्षधर हैं। समाज में महिलाओं और बच्चों के विरुद्ध होने वाले अपराधों के प्रति किसी भी प्रकार की सहानुभूति नहीं हो सकती। लेकिन उतना ही आवश्यक यह भी है कि कानून का व्यवहार प्रत्येक व्यक्ति के साथ समान हो। यदि कानून केवल कमजोरों पर कठोर दिखाई दे और प्रभावशाली लोगों के प्रति मौन या नरम रहे, तो न्याय व्यवस्था पर जनता का विश्वास कमजोर होना स्वाभाविक है।
अपराधी चाहे गरीब हो या अमीर, सामान्य नागरिक हो या प्रभावशाली व्यक्तिकृयदि वह कानून की दृष्टि में दोषी है, तो उसके विरुद्ध समान, निष्पक्ष, पारदर्शी और कानून सम्मत कार्रवाई होना ही सच्चे लोकतंत्र, संविधान और न्याय व्यवस्था की पहचान है। कानून की शक्ति किसी व्यक्ति की हैसियत नहीं, बल्कि उसके अपराध के आधार पर दिखाई देनी चाहिए।
आज आवश्यकता इस बात की है कि अपराध के प्रति शून्य सहिष्णुता की नीति अपनाते हुए न्याय, समानता और संविधान की गरिमा को सर्वोच्च स्थान दिया जाए। कानून का भय प्रत्येक अपराधी के मन में समान रूप से होना चाहिए और प्रत्येक नागरिक को यह विश्वास होना चाहिए कि न्याय का तराजू किसी व्यक्ति की संपत्ति, पद, प्रभाव या पहचान नहीं, बल्कि केवल कानून और साक्ष्यों के आधार पर निर्णय करता है।
कानून का राज तभी सार्थक होगा, जब कार्रवाई भी समान होगी और न्याय भी सबके लिए समान होगा। यही संविधान की भावना है, यही लोकतंत्र की आत्मा है और यही भारत के न्याय तंत्र की वास्तविक पहचान है।
जनहित में जारी
राजेश टंडन
वरिष्ठ अधिवक्ता, अजमेर
पूर्व उपाध्यक्ष, वरिष्ठ नागरिक कल्याण बोर्ड
जयपुर (राजस्थान)

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