गुरु पूर्णिमा आषाढ़ मास की पूर्णिमा को मनाई जाती है। यह दिन महर्षि वेद व्यास के जन्म और गुरु के प्रति सम्मान प्रकट करने के लिए समर्पित है।

अंधकार से प्रकाश:—
‘गु’ का अर्थ अज्ञान (अंधकार) और ‘रु’ का अर्थ उसका नाश करने वाला होता है। गुरु वह हैं जो हमारे जीवन से अज्ञान का अंधकार मिटाकर ज्ञान का प्रकाश फैलाते हैं।
इसी पावन तिथि पर आदि गुरु महर्षि वेद व्यास जी का जन्म हुआ था, जिन्होंने वेदों का विभाजन किया और महाभारत जैसे महान ग्रंथ की रचना की। इसलिए इस दिन को ‘व्यास पूर्णिमा’ भी कहते हैं।कृतज्ञता व्यक्त करना: यह पर्व माता-पिता, शिक्षकों और आध्यात्मिक गुरुओं के प्रति आभार जताने का विशेष अवसर है।परंपराएं और पूजा गुरु पूजन: इस दिन लोग अपने गुरुओं के चरण स्पर्श करते हैं और उनकी पूजा करके गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः—
.पूर्णिमा का सबसे बड़ा उद्देश्य गुरु के प्रति सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करना है।
गुरु हमें अज्ञान के अंधकार से बाहर निकालकर ज्ञान का प्रकाश देते हैं।
लोग इस धरती पर पैदा होते हैं। कुछ सफल होते हैं, कुछ नहीं। कुछ अमीर हैं, कुछ नहीं हैं। समानताएं और असमानताएं हमेशा होती हैं, लेकिन मोटे तौर पर, जन्म लेने वाले प्रत्येक व्यक्ति का जीवन चक्र समान होता ।
गुरु हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाता है। हमें जीवन जीने का सहीं रास्ता बताता है जिस रास्ते पर चलकर जीवन को संवारा जा सकता है। एक नई ऊँचाई को छुआ जा सकता है इसलिये गुरू धरती पर का प्रतिनिधि होता है, और वह केवल भगवान के बारे में ही कहता है और कुछ नहीं। सच्चा गुरु वही है , जिसकी रुचि भौतिकवादी जीवन में नहीं होती। वह केवल और केवल भगवान की ही खोज में रहता है।
गुरु वह व्यक्ति होता है जो हमें ज्ञान, संस्कार और सही मार्गदर्शन प्रदान करता है। वह हमारे जीवन के अंधकार को दूर कर प्रकाश की ओर ले जाता है।
बिना शिक्षा के जीवन कभी भी सार्थक नहीं हो सकता। एक शिक्षित व्यक्ति अशिक्षित व्यक्ति के मुकाबले अधिक सम्मान पूर्वक और आसानी से जीवन जी सकता है।
गुरु के वचनों पर शंका करना शिष्यत्व पर कलंक है। जिस दिन शिष्य ने गुरु को मानना शुरू किया उसी दिन से उसका उत्थान शुरू शुरू हो जाता है और जिस दिन से शिष्य ने गुरु के प्रति शंका करनी शुरू की, उसी दिन से शिष्य का पतन शुरू हो जाता है।
सच्चाई हम रोज एक दूसरे से कुछ न कुछ नया सीखते हैं, अत:. सभी एक दूसरों के गुरु ही हैं। हमे परस्पर एक दूसरे का सम्मान करना चाहिए। गुरु जी के प्रति कृतज्ञता प्रकट करे। उनके चरण स्पर्श करे। गुरु जन को शत् शत् नमन और प्रणाम।
डॉ जे के गर्ग
पूर्व संयुक्त निदेशक कॉलेज शिक्षा, जयपुर