80 वें स्वतन्त्रता दिवस के पावन अवसर पर

नहीं चाहिए मुझे सम्मान-पत्र,
न ही वीरता का कोई पदक।
सरकार मेरे,
मेरे माई-बाप,
मेरे क्षेत्र के सांसद, विधायक
और छुटभैये नेतागण,
बस आप सबसे
मेरी इतनी-सी विनती है।
यदि सचमुच मेरे बलिदान से
आपके हृदय को पीड़ा पहुँची है,
और आप मेरे बलिदान का
सम्मान करना चाहते हैं,
तो बस इतना कर दीजिएगा—
मेरे बच्चों की पढ़ाई
बीच में न छूटे।
मेरी पत्नी को
समय पर पेंशन मिल जाए।
चंद नोटों की खातिर
उसे बार-बार
दूर-दराज़ के सैन्य कार्यालयों के चक्कर
न लगाने पड़ें।
मेरे बूढ़े पिता को
यह सिद्ध करने के लिए
कि शहीद उनका ही बेटा था,
दर-दर की ठोकरें
न खानी पड़ें।
मेरी पत्नी को भी
यह साबित करने के लिए
कि शहीद जवान उसका ही पति था,
बार-बार सेना कार्यालयों और मंत्रालयों के
चक्कर न काटने पड़ें।
अपने आत्मसम्मान का गला घोंटकर
किसी के सामने गिड़गिड़ाना न पड़े।
तभी सही मायनों में
मेरी आत्मा को
सुकून और शांति मिलेगी।
तब मुझे मातृभूमि के लिए
अपने बलिदान पर
अपार गर्व होगा।
प्रतिष्ठा, सम्मान, पदक
और रोल ऑफ ऑनर—
इनकी अपनी जगह है,
अपनी मर्यादा है,
अपना गौरव है।
पर…
यदि सम्मानपूर्वक जीने का अधिकार ही
गिरवी रखना पड़े,
तो दीवार पर टंगे सम्मान-पत्र
और शोकेस में सजे वीरता के पदक
शहीद के परिजनों का
मानो उपहास करते हुए
प्रतीत होते हैं। 000
श्याम कुमार राई
‘सलुवावाला’