पलाड़ा परिवार की दोहरी सियासी दस्तक

नगर निगम और जिला परिषद : दोनों पर नजर

अजमेर की स्थानीय राजनीति में आरक्षण की नई तस्वीर ने कई राजनीतिक समीकरणों को अचानक दिलचस्प बना दिया है। अजमेर नगर निगम के महापौर और अजमेर जिला परिषद के जिला प्रमुख पद अनारक्षित महिला के लिए तय होने की स्थिति में अब सबसे ज्यादा चर्चा उस राजनीतिक परिवार की है, जिसने अजमेर की पंचायत से लेकर विधानसभा तक अपनी प्रभावशाली मौजूदगी दर्ज कराई हैकृपलाड़ा परिवार।

राजनीतिक गलियारों में कयास लगाए जा रहे हैं कि कद्दावर भाजपा नेता भंवर सिंह पलाड़ा इस चुनावी अवसर को हाथ से जाने नहीं देंगे। उनकी पत्नी सुशीला कंवर पलाड़ा, जो दो बार जिला प्रमुख रह चुकी हैं, अथवा परिवार की अगली पीढ़ी से पुत्रवधु को नगर निगम के चुनावी संग्राम में उतारने की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता। हालांकि, उम्मीदवार को लेकर अभी कोई आधिकारिक घोषणा सामने नहीं आई है, इसलिए इसे फिलहाल राजनीतिक संभावना और चुनावी अटकल के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

पलाड़ा परिवार के राजनीतिक इतिहास को देखते हुए यह कयास पूरी तरह हवा में भी नहीं हैं। सुशीला कंवर पलाड़ा 2020 में भाजपा के आधिकारिक प्रत्याशी के विरुद्ध निर्दलीय जिला प्रमुख चुनाव लड़ीं और जीत दर्ज की थी। उस समय जिला परिषद में भाजपा के पास बहुमत होने के बावजूद उन्होंने 23 मत हासिल कर भाजपा प्रत्याशी को पराजित किया था। यह घटना पलाड़ा परिवार की संगठनात्मक पकड़ और व्यक्तिगत राजनीतिक प्रभाव का एक महत्वपूर्ण उदाहरण मानी जाती है।

इसके बाद राजनीतिक परिस्थितियां बदलीं। भंवर सिंह पलाड़ा और सुशीला कंवर ने 2024 में भाजपा में वापसी की। यानी आज पलाड़ा परिवार और भाजपा के बीच राजनीतिक समीकरण उस दौर से अलग हैं, जब परिवार ने पार्टी से अलग राह चुनी थी।

यही कारण है कि आगामी स्थानीय चुनाव में पलाड़ा परिवार की संभावित भूमिका को केवल एक परिवार के टिकट की दावेदारी के रूप में देखना राजनीतिक भूल होगी। यह भाजपा की स्थानीय रणनीति, संगठनात्मक समीकरण और अजमेर में प्रभावशाली चेहरों के इस्तेमाल का सवाल भी है।
नगर निगम और जिला परिषदकृदोनों पदों का महिला के लिए अनारक्षित होना पलाड़ा परिवार के लिए असाधारण राजनीतिक अवसर पैदा करता है। यदि परिवार एक स्थान पर सुशीला कंवर या पुत्रवधु को और दूसरे स्तर पर किसी अन्य समर्थित चेहरे को आगे करता है, तो पलाड़ा एक साथ शहरी और ग्रामीणकृदोनों राजनीतिक क्षेत्रों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने की कोशिश कर सकते हैं।

लेकिन यहां सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि भाजपा संगठन इस रणनीति को किस नजर से देखता है
स्थानीय चुनाव विधानसभा या लोकसभा चुनाव से अलग होते हैं। यहां पार्टी के चुनाव चिह्न से अधिक व्यक्तिगत जनसंपर्क, जातीय-सामाजिक समीकरण, वार्ड स्तर की पकड़, पार्षदों का नेटवर्क और स्थानीय संगठन पर प्रभाव निर्णायक हो सकता है। खासकर महापौर का चुनाव अप्रत्यक्ष प्रक्रिया से होने की स्थिति में पार्षदों का समर्थन अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है। राजस्थान में नगर निकायों के अध्यक्ष पदों की चुनावी व्यवस्था में निर्वाचित सदस्यों की भूमिका महत्वपूर्ण रही है।

इसलिए पलाड़ा परिवार यदि नगर निगम की दौड़ में उतरता है तो मुकाबला केवल चुनाव मैदान में उतरने तक सीमित नहीं रहेगा। असली लड़ाई पार्षद टिकटों, वार्डवार समीकरणों और चुनाव के बाद समर्थन जुटाने की होगी।

दूसरी ओर जिला परिषद का मैदान पलाड़ा परिवार के लिए बिल्कुल अपरिचित नहीं है। सुशीला कंवर का पूर्व जिला प्रमुख के रूप में अनुभव इस चुनाव में परिवार के लिए एक अतिरिक्त राजनीतिक पूंजी बन सकता है। 2020 का जिला प्रमुख चुनाव यह दिखा चुका है कि बहुमत की राजनीति और व्यक्तिगत प्रभाव की राजनीति हमेशा एक जैसी नहीं होती।

यही वजह है कि अजमेर की आगामी स्थानीय राजनीति में एक सवाल लगातार घूम रहा हैकृक्या पलाड़ा परिवार एक बार फिर श्एक पदश् की राजनीति करेगा या नगर निगम और जिला परिषद दोनों मोर्चों पर अपनी ताकत आजमाएगा

अगर यह परिवार दोनों स्तरों पर सक्रिय होता है, तो अजमेर भाजपा के भीतर भी नए समीकरण बनना स्वाभाविक है। एक ओर संगठन के पुराने दावेदार होंगे, दूसरी ओर प्रभावशाली राजनीतिक परिवार का दावा। टिकट वितरण से लेकर चुनावी रणनीति तक हर फैसला संभावित रूप से शक्ति संतुलन को प्रभावित कर सकता है।

फिलहाल किसी नाम पर अंतिम मुहर नहीं लगी है। लेकिन राजनीति में कई बार चुनाव की औपचारिक घोषणा से पहले ही असली मुकाबले की पटकथा लिखी जाने लगती है।

अजमेर में आरक्षण ने पद तय कर दिए हैंय अब देखना यह है कि इन पदों तक पहुंचने के लिए कौन-सा राजनीतिक परिवार अपनी पूरी ताकत झोंकता है।
और यदि पलाड़ा परिवार ने सचमुच नगर निगम और जिला परिषदकृदोनों मोर्चों पर दस्तक दे दी, तो अजमेर का स्थानीय चुनाव महज वार्ड और पंचायत का चुनाव नहीं रहेगाय यह राजनीतिक प्रभाव, संगठनात्मक ताकत और परिवार की अगली सियासी पारी की परीक्षा भी बन सकता है।

ऋषिराज शर्मा

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