
भारत के इतिहास में 1857 का वर्ष केवल एक विद्रोह, सैनिक असंतोष अथवा अचानक भड़की हुई हिंसक घटना का वर्ष नहीं था। वह भारतीय जनमानस में लंबे समय से संचित असंतोष, स्वाधीनता की आकांक्षा और विदेशी सत्ता से मुक्ति की चेतना के एक विराट विस्फोट का वर्ष था। 10 मई 1857 को मेरठ से उठी ज्वाला शीघ्र ही दिल्ली, कानपुर, लखनऊ, झाँसी, अवध, बिहार और मध्य भारत के अनेक क्षेत्रों तक फैल गई। आजादी के इस महाअभियान के साथ मंगल पांडे, बहादुरशाह जफर, नाना साहब पेशवा, तात्या टोपे, रानी लक्ष्मीबाई, बेगम हजरत महल और वीर कुंवर सिंह जैसे अनेक नाम अमर हो गए। किंतु इस व्यापक राष्ट्रीय उभार की पृष्ठभूमि में कुछ ऐसे व्यक्तित्व भी थे, जिनकी भूमिका प्रत्यक्ष युद्धभूमि के बजाय चेतना, संगठन, संपर्क और वैचारिक तैयारी के स्तर पर थी। उन्हीं में एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण नाम है—महर्षि दयानंद सरस्वती।
महर्षि दयानंद का नाम सामान्यतः आर्य समाज के संस्थापक, वेदों के पुनरुत्थान के प्रणेता, सामाजिक सुधारक और धार्मिक जागरण के महानायक के रूप में लिया जाता है। किंतु उनके जीवन का एक और पक्ष ऐसा है, जिस पर अपेक्षाकृत कम चर्चा हुई है—1857 के स्वाधीनता संग्राम की पृष्ठभूमि में उनकी संगठनात्मक एवं प्रेरणात्मक भूमिका। उपलब्ध ऐतिहासिक सामग्री, परंपरागत विवरणों, समकालीन परिस्थितियों और हाल में सामने आए शोधों को एक साथ रखकर देखने पर यह प्रश्न उठता है कि क्या महर्षि दयानंद केवल उस समय के एक भ्रमणशील संन्यासी थे, अथवा वे उस व्यापक राष्ट्रीय जागरण के उन सूत्रधारों में भी शामिल थे, जिसने 1857 के महाविस्फोट को संभव बनाया? यह प्रश्न इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि 1857 को समझने के लिए केवल 10 मई 1857 से इतिहास आरंभ करना पर्याप्त नहीं है। किसी भी बड़े जनांदोलन की तरह उसके पीछे भी मनोवैज्ञानिक, सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक और संगठनात्मक प्रक्रियाएँ होती हैं। 1857 के संदर्भ में रोटी और कमल का रहस्यमय संचार, साधु-संन्यासियों और फकीरों की गतिशीलता, विभिन्न क्षेत्रों के नेतृत्वकर्ताओं के बीच संपर्क तथा अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध व्यापक असंतोष इस बात की ओर संकेत करते हैं कि वातावरण केवल स्वतःस्फूर्त सैनिक विद्रोह का नहीं था। समकालीन अंग्रेज अधिकारियों को भी इन गतिविधियों ने असहज और आशंकित किया था।
महर्षि दयानंद सरस्वती का प्रारंभिक जीवन ही सत्य की खोज और रूढ़ियों से संघर्ष की कहानी है। मूल नाम मूलशंकर था। किशोरावस्था में मृत्यु और जीवन के प्रश्नों ने उनके मन को उद्वेलित किया। उन्होंने गृहत्याग किया और वर्षों तक भारत के विभिन्न भागों में भ्रमण करते हुए सत्य, धर्म और ज्ञान की खोज की। उनका संन्यास किसी एक मठ या सीमित धार्मिक संस्था तक सीमित नहीं था। वे भारत की जनता, उसकी परंपराओं, उसके धार्मिक जीवन और उसकी वास्तविक परिस्थितियों से प्रत्यक्ष परिचित होते गए। यह भ्रमणशील जीवन आगे चलकर उनके लिए एक विशिष्ट शक्ति बना। वे उन दिनों भारत के विभिन्न क्षेत्रों में पहुँच सकते थे, जहाँ सामान्य राजनीतिक कार्यकर्ताओं का पहुँचना कठिन था। संन्यासी, साधु, फकीर और धार्मिक यात्री उस समय भारतीय समाज में अत्यंत व्यापक गतिशीलता रखते थे। वे गाँव-गाँव जाते थे, लोगों से संपर्क करते थे और बिना किसी औपचारिक राजनीतिक संगठन के संदेशों का आदान-प्रदान कर सकते थे। 1857 के संदर्भ में साधु-संन्यासियों की इसी गतिशीलता का उल्लेख विभिन्न स्रोतों में मिलता है। यही वह सामाजिक-सांस्कृतिक नेटवर्क था, जिसके भीतर महर्षि दयानंद जैसे व्यक्तित्व की उपस्थिति को समझना आवश्यक है।
1855 का हरिद्वार कुंभ महर्षि दयानंद के जीवन का अत्यंत महत्त्वपूर्ण पड़ाव माना जाता है। उपलब्ध विवरणों के अनुसार इसी कालखंड में उनका संपर्क स्वामी पूर्णानंद से हुआ और उन्होंने संन्यास की दिशा में निर्णायक कदम उठाया। बाद में उनका संबंध स्वामी विरजानंद से जुड़ा, जिनसे उन्होंने गहन शास्त्रीय अध्ययन किया। कुछ शोधपरक विवरण 1855 के हरिद्वार कुंभ को उस व्यापक राष्ट्रीय जागरण के संदर्भ में भी देखते हैं, जिसमें साधु-संतों और विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिनिधियों के बीच संपर्क बढ़ रहा था।
हरिद्वार केवल तीर्थ नहीं था। वह भारत के विभिन्न क्षेत्रों से आने वाले लोगों का विशाल संपर्क-केंद्र था। देश के दूर-दराज के हिस्सों से साधु, व्यापारी, ग्रामीण, सैनिक, धार्मिक नेता और सामान्य नागरिक वहाँ आते थे। ऐसी परिस्थितियों में किसी संदेश का प्रसार आधुनिक राजनीतिक संगठन की तुलना में कहीं अधिक व्यापक सामाजिक माध्यम से हो सकता था। यही कारण है कि 1857 की पूर्वपीठिका में धार्मिक मेलों और साधु-संन्यासी परंपरा को नए दृष्टिकोण से देखने की आवश्यकता है। यदि स्वाधीनता का संदेश राजनीतिक सभाओं के माध्यम से ही फैलना होता, तो अंग्रेजी शासन की निगरानी में वह जल्दी पकड़ लिया जाता। लेकिन भारतीय समाज की धार्मिक और सांस्कृतिक संरचना ने संचार का एक स्वाभाविक और अपेक्षाकृत सुरक्षित माध्यम उपलब्ध कराया। महर्षि दयानंद की 1857 से संबद्धता का सबसे चर्चित पक्ष उनका नाना साहब पेशवा से संपर्क है। शोधपरक विवरणों में 1856 में कानपुर में नाना साहब के निवास पर दयानंद के जाने और उसके बाद कानपुर तथा इलाहाबाद क्षेत्र में उनके आवागमन का उल्लेख मिलता है।
यह तथ्य यदि व्यापक राजनीतिक परिस्थितियों के संदर्भ में देखा जाए तो अत्यंत महत्त्वपूर्ण बन जाता है। नाना साहब 1857 के प्रमुख नेतृत्वकर्ताओं में थे और उनके साथ तात्या टोपे तथा अजीमुल्ला खान जैसे व्यक्तियों का संबंध था। भारत सरकार के आजादी का अमृत महोत्सव पोर्टल में भी अजीमुल्ला खान को 1857 के आंदोलन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला व्यक्ति बताया गया है। यहाँ महर्षि दयानंद की भूमिका को केवल किसी एक बैठक या किसी एक व्यक्ति से संपर्क तक सीमित करके देखना उचित नहीं होगा। प्रश्न यह है कि उस समय भारत के विभिन्न हिस्सों में घूमने वाला एक युवा संन्यासी किन लोगों से मिल रहा था, किन क्षेत्रों में जा रहा था और किन सामाजिक समूहों से संवाद कर रहा था। यही वे प्रश्न हैं जिनसे इतिहास के उस अध्याय की नई व्याख्या संभव होती है।
1857 की क्रांति का प्रारंभिक विस्फोट मेरठ से हुआ। 10 मई 1857 को वहाँ के सैनिकों ने विद्रोह किया और उसके बाद दिल्ली की ओर कूच किया। भारत सरकार के आजादी का अमृत महोत्सव पोर्टल पर 1857 को ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के विरुद्ध पहला व्यापक सामान्य विद्रोह बताया गया है। महर्षि दयानंद और मेरठ का संबंध इसलिए उल्लेखनीय है कि कुछ शोधकर्ताओं ने 1857 के आसपास उनके मेरठ प्रवास तथा वहाँ साधु-संन्यासी गतिविधियों से उनके संबंध की ओर संकेत किया है। हालिया शोध में यह दावा सामने आया है कि मेरठ क्षेत्र में एक लोकप्रिय संन्यासी की गतिविधियाँ अंग्रेजी प्रशासन के लिए संदेह का कारण बनी थीं और कुछ मौखिक परंपराएँ उस संन्यासी की पहचान दयानंद से जोड़ती हैं। यहाँ इतिहास की एक अत्यंत रोचक संभावना सामने आती है। यदि कोई संन्यासी सैनिक छावनियों, ग्रामीण समाज और धार्मिक स्थलों के बीच आवागमन कर रहा हो, तो वह राजनीतिक संदेश के प्रसार का अदृश्य माध्यम बन सकता था। ऐसे व्यक्ति को सामान्य जनता भी सहजता से स्वीकार करती और अंग्रेजी शासन की निगरानी से बचना भी संभव होता। इसीलिए महर्षि दयानंद के जीवन को केवल उनके बाद के आर्य समाज आंदोलन के संदर्भ में देखना इतिहास की एक तस्वीर को अधूरा छोड़ देना होगा।
1857 से पहले उत्तर भारत में रोटियों के एक गाँव से दूसरे गाँव तक पहुँचने और कमल के फूलों के प्रसार की घटनाएँ ऐतिहासिक चर्चा का विषय रही हैं। अंग्रेज अधिकारी भी इस रहस्यमय गतिविधि को लेकर चिंतित थे। इन प्रतीकों का वास्तविक संदेश क्या था, इसका पूर्ण और निर्णायक उत्तर आज भी इतिहासकारों के लिए शोध का विषय है। किंतु इतना स्पष्ट है कि इन गतिविधियों ने उस समय व्यापक बेचैनी और संगठन की भावना को प्रतिबिंबित किया। रोटी भारतीय समाज में साझा जीवन, सहभागिता और सामान्य जन का प्रतीक थी; कमलधार्मिक-सांस्कृतिक अर्थों से जुड़ा हुआ था। यदि इन दोनों को व्यापक सामाजिक नेटवर्क में देखा जाए तो यह भारतीय समाज के विभिन्न वर्गों को जोड़ने वाली सांकेतिक भाषा का रूप ले सकता था। महर्षि दयानंद जैसे संन्यासी के लिए ऐसी सांकेतिक और मौखिक संचार-व्यवस्था स्वाभाविक माध्यम हो सकती थी। उनके पास किसी आधुनिक संगठन का औपचारिक ढाँचा नहीं था, परंतु उनके पास भारत-भ्रमण का अनुभव, धार्मिक-सांस्कृतिक संपर्क और जनमानस से संवाद की क्षमता थी। यही कारण है कि आज जब 1857 के इतिहास की पुनर्व्याख्या हो रही है, तो रोटी और कमल के रहस्य को महर्षि दयानंद के भ्रमण और संपर्कों के साथ जोड़कर देखना एक गंभीर शोध-विषय बन चुका है। 2026 में प्रकाशित A.K. Gandhi की पुस्तक Swami Dayanand and the 1857 Revolution पर लेखक ने भी रोटी और कमल, मथुरा की कथित गुप्त बैठक तथा 1855 के कुंभ को 1857 की पूर्व-योजना के संदर्भ में महत्वपूर्ण कड़ियों के रूप में प्रस्तुत किया है।
महर्षि दयानंद का संबंध मथुरा के स्वामी विरजानंद से था। मथुरा उस समय केवल धार्मिक नगर नहीं था, बल्कि उत्तर भारत के अनेक तीर्थों और यात्रियों को जोड़ने वाला प्रमुख केंद्र था। दयानंद ने यहाँ वैदिक शिक्षा प्राप्त की और आगे चलकर भारतीय समाज को वैचारिक रूप से बदलने की दिशा में अपना जीवन समर्पित किया। कुछ शोधपरक स्रोत मथुरा क्षेत्र में हुई गुप्त बैठकों का उल्लेख करते हैं, जिनमें तत्कालीन राजनीतिक और सामाजिक नेतृत्व से जुड़े व्यक्तियों की उपस्थिति बताई गई है। इन विवरणों में नाना साहब, तात्या टोपे, बहादुरशाह जफर, कुंवर सिंह, बेगम हजरत महल आदि के नामों के साथ दयानंद का भी संबंध बताया गया है। इन विवरणों को आगे और प्राथमिक स्रोतों के आधार पर शोध की आवश्यकता है, किंतु इससे इतना अवश्य स्पष्ट होता है कि दयानंद के जीवन का वह काल केवल आध्यात्मिक अध्ययन और एकांत साधना तक सीमित मानना पर्याप्त नहीं है। उनके जीवन की गतिविधियों में राष्ट्रीय चेतना की एक धारा भी दिखाई देती है।
महर्षि दयानंद का सबसे बड़ा योगदान शायद किसी एक युद्ध में भाग लेने से भी अधिक व्यापक था। उन्होंने भारतीय समाज को मानसिक दासता से मुक्त करने का कार्य किया। उनका उद्घोष था—वेदों की ओर लौटो। इसका अर्थ केवल धार्मिक पुनरुत्थान नहीं था; यह भारतीय आत्मविश्वास के पुनर्निर्माण का आह्वान भी था।
उन्होंने भारतीयों को अपनी भाषा, अपने ज्ञान, अपनी संस्कृति और अपने वैचारिक स्रोतों पर विश्वास करना सिखाया। विदेशी सत्ता की राजनीतिक अधीनता के साथ यदि मानसिक और सांस्कृतिक अधीनता भी स्वीकार कर ली जाए, तो राजनीतिक स्वतंत्रता भी अधूरी रह जाती है। दयानंद ने इसी मानसिक दासता को चुनौती दी। उनके बाद की वैचारिक परंपरा में स्वराज्य, स्वदेशी, शिक्षा, सामाजिक सुधार और राष्ट्रीय आत्मसम्मान की जो चेतना विकसित हुई, उसने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के आगामी चरणों को भी गहरे रूप से प्रभावित किया। आर्य समाज के अनेक कार्यकर्ताओं ने आगे चलकर राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। इसलिए 1857 और दयानंद के संबंध को केवल युद्ध की रणनीति के प्रश्न तक सीमित करना उनके व्यापक राष्ट्रीय योगदान को छोटा करना होगा।
यदि उपलब्ध सामग्री को एक साथ रखकर देखा जाए तो एक रोचक तस्वीर उभरती है। एक ओर 1855 का हरिद्वार है, जहाँ देश के विभिन्न हिस्सों से विशाल जनसमूह एकत्र होता है। दूसरी ओर दयानंद जैसे भ्रमणशील संन्यासी हैं, जो शीघ्र ही उत्तर भारत के अनेक क्षेत्रों में दिखाई देते हैं। फिर नाना साहब और अन्य क्रांतिकारी नेतृत्वकर्ताओं से संपर्क के विवरण मिलते हैं। इसी काल में रोटी और कमल के रहस्यमय संदेशों की गतिविधियाँ दिखाई देती हैं। इसके बाद मेरठ में 10 मई 1857 को वह विस्फोट होता है, जो देखते-देखते उत्तर भारत के विशाल भूभाग में फैल जाता है। इन घटनाओं को अलग-अलग देखना केवल संयोग लग सकता हैं। लेकिन इतिहास का काम केवल घटनाओं को गिनना नहीं, उनके बीच संभावित संबंधों की खोज करना भी है।
यहीं महर्षि दयानंद का व्यक्तित्व महत्वपूर्ण हो जाता है। वे सैनिक नेता नहीं थे। वे किसी राजदरबार के सेनापति नहीं थे। वे किसी औपचारिक राजनीतिक दल के प्रमुख नहीं थे। लेकिन उनके पास वह शक्ति थी, जो उस समय किसी भी व्यापक जनजागरण के लिए आवश्यक थी—जनसंपर्क, भ्रमणशीलता, धार्मिक-सांस्कृतिक स्वीकार्यता और लोगों को प्रेरित करने की क्षमता। इसी दृष्टि से उन्हें 1857 के राजनीतिक-सामाजिक वातावरण के महत्त्वपूर्ण वैचारिक एवं संगठनात्मक सूत्रधारों में से एक मानने की संभावना गंभीरता से विचारणीय है। इतिहास में मौन भी एक साक्ष्य बन सकता है।
महर्षि दयानंद के जीवन के 1855 से 1860 के बीच के वर्षों को लेकर शोधकर्ताओं ने विशेष रुचि दिखाई है। हालिया शोध में इस अवधि के दस्तावेजी अंतराल को 1857 से उनके संबंध की जाँच का महत्त्वपूर्ण आधार बनाया गया है। A.K. Gandhi के अनुसार उनकी पुस्तक का एक प्रमुख शोध-प्रश्न भी यही था कि दयानंद के जीवन के इस काल के बारे में उपलब्ध जानकारी इतनी सीमित क्यों है और उपलब्ध परिस्थितिजन्य साक्ष्यों को कैसे समझा जाए। इतिहास में हर मौन प्रमाण नहीं होता, लेकिन हर मौन को अनदेखा कर देना भी उचित इतिहासलेखन नहीं है। विशेषकर तब, जब उस मौन अवधि में व्यक्ति का जीवन उन स्थानों और व्यक्तियों के निकट दिखाई देता हो, जो आगे चलकर 1857 के घटनाक्रम के केंद्र में रहे।
इसलिए आवश्यकता है कि दयानंद के जीवन की उस अवधि पर नए सिरे से अभिलेखीय शोध किया जाए—ब्रिटिश प्रशासनिक रिपोर्टों, गजेटियरों, यात्रा-विवरणों, समकालीन भारतीय ग्रंथों, मौखिक परंपराओं और विभिन्न रियासतों के दस्तावेजों को साथ रखकर।
1857 का संग्राम असफल हुआ, लेकिन उसने भारत की स्वतंत्रता की चेतना को समाप्त नहीं किया। इसके विपरीत, उसने आने वाली पीढ़ियों को एक गहरा संदेश दिया कि विदेशी सत्ता अजेय नहीं है। महर्षि दयानंद ने इसी चेतना को एक दीर्घकालीन वैचारिक आधार प्रदान किया। उन्होंने भारतीय समाज से कहा कि अपनी जड़ों की ओर लौटो, अपने ज्ञान पर विश्वास करो, अंधविश्वास और सामाजिक कुरीतियों से मुक्त होओ और आत्मसम्मान के साथ खड़े होओ। यहाँ 1857 और दयानंद का संबंध और अधिक अर्थपूर्ण हो जाता है। 1857 ने राजनीतिक स्वतंत्रता की आकांक्षा को ज्वालामुखी की तरह प्रकट किया; दयानंद ने उसके लिए आवश्यक सांस्कृतिक आत्मविश्वास और वैचारिक स्वाधीनता की भूमि तैयार की।
एक दृष्टि से कहा जा सकता है कि 1857 की तलवारें जिस राजनीतिक स्वतंत्रता के लिए उठीं, दयानंद ने उस स्वतंत्रता के लिए भारतीय आत्मा को तैयार करने का कार्य किया। अब इतिहास को नए प्रश्न पूछने होंगे इतिहास किसी एक अंतिम वाक्य में बंद नहीं होता। नई सामग्री मिलने पर इतिहास के पुराने अध्यायों की नई व्याख्या होती है। आज महर्षि दयानंद और 1857 के संबंध को लेकर जो शोध सामने आ रहा है, वह हमें यही अवसर देता है। प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि दयानंद को 1857 के इतिहास में एक और नाम के रूप में जोड़ दिया जाए। प्रश्न यह होना चाहिए कि क्या 1857 की पूर्वपीठिका में साधु-संन्यासी नेटवर्क, धार्मिक मेलों, ग्रामीण संपर्क-व्यवस्था, प्रतीकात्मक संदेशों और राष्ट्र-जागरण की उस धारा को पर्याप्त महत्त्व दिया गया है, जिसमें दयानंद जैसे व्यक्तित्व सक्रिय थे? यदि इसका उत्तर खोजा जाए, तो संभव है कि 1857 की कहानी केवल सैनिक छावनियों की कहानी न रह जाए। वह भारत के गाँवों, तीर्थों, अखाड़ों, मठों, साधु-संन्यासियों, किसानों, सैनिकों, राजाओं और सामान्य जनता के सम्मिलित मानस की कहानी बन जाए। और तब महर्षि दयानंद सरस्वती उस कथा में केवल आर्य समाज के संस्थापक के रूप में नहीं, बल्कि उस विराट राष्ट्रीय चेतना के अग्रदूत के रूप में दिखाई देंगे, जिसने आगे चलकर भारत के स्वतंत्रता संघर्ष को वैचारिक ऊर्जा प्रदान की।
महर्षि दयानंद सरस्वती का जीवन भारतीय पुनर्जागरण की सबसे शक्तिशाली धाराओं में से एक है। उनके व्यक्तित्व में आध्यात्मिक साधना, वैदिक पुनर्जागरण, सामाजिक सुधार, शिक्षा, राष्ट्रचेतना और स्वाधीनता की आकांक्षा एक साथ दिखाई देती है। 1857 के संदर्भ में उपलब्ध सामग्री को गंभीरता से पढ़ने पर उनके जीवन के अनेक सूत्र उस काल की उथल-पुथल से जुड़ते दिखाई देते हैं—1855 का हरिद्वार, उत्तर भारत का व्यापक भ्रमण, मथुरा और साधु-संन्यासी संपर्क, नाना साहब से संबंध, मेरठ से जुड़े विवरण और 1857 के पूर्व दिखाई देने वाली सांकेतिक संचार-व्यवस्था। इसलिए अब समय आ गया है कि 1857 के इतिहास में महर्षि दयानंद सरस्वती की भूमिका पर गंभीर और विस्तृत शोध हो। यदि आगे के अभिलेखीय अनुसंधान से इन संबंधों की और पुष्टि होती है, तो भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को एक नई दृष्टि मिलने की संभावना बनती है। एक बात निर्विवाद है—महर्षि दयानंद केवल एक धर्मसुधारक नहीं थे। वे भारतीय आत्मसम्मान के पुनर्जागरण के महानायक थे। उन्होंने भारतीयों को यह विश्वास दिया कि भारत अपनी शक्ति, अपने ज्ञान और अपनी संस्कृति के बल पर स्वयं को पुनः प्रतिष्ठित कर सकता है और संभवतः यही वह चेतना थी, जिसकी राजनीतिक अभिव्यक्ति 1857 में दिखाई दी।
1857 की ज्वाला को यदि केवल मेरठ की छावनी से देखा जाएगा, तो इतिहास का एक बड़ा हिस्सा छूट जाएगा। उसे यदि भारत के तीर्थों, गाँवों, साधु-संन्यासियों, जनमानस और उस समय के राष्ट्रीय जागरण की दृष्टि से देखा जाएगा, तो महर्षि दयानंद सरस्वती का एक नया और अधिक विराट व्यक्तित्व हमारे सामने आएगा। इसलिए 1857 को स्मरण करते समय केवल रणभूमि के वीरों को नहीं, उन चेतना-वाहकों को भी स्मरण करना चाहिए जिन्होंने रणभूमि तैयार होने से पहले भारतीय मन को स्वतंत्रता के लिए तैयार किया। महर्षि दयानंद सरस्वती ऐसे ही एक संभावित महान सूत्रधार थे—और भारतीय इतिहास में उनके इस पक्ष पर पुनर्विचार अब समय की आवश्यकता है।
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प्रो सुरेश कुमार अग्रवाल
कुलगुरू
महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय, अजमेर