25 अगस्त, प्रथम गोरखा बलिदानी दुर्गा मल्ल के शहादत दिवस पर विशेष

श्याम कुमार राई

“यूं तो दुनिया में सभी आते हैं मरने के लिए

  मौत उसकी है खास जिसका जमाना करे अफसोस।”
      प्रथम गोरखा शहीद दुर्गा मल्ल (1 जुलाई 1913- 25 अगस्त, 1944), आजाद हिन्द फौज के गोरखा सैनिक जो “कदम कदम बढ़ाए जा खुशी के गीत गाए जा…” गाते हुए फांसी का फंदा चूमने वाले आजाद हिंद सेना के बहादुर गोरखा सिपाही दुर्गा मल्ल को कहीं कहीं दुर्गा बहादुर ‘थापा मगर’ भी बोला और लिखा हुआ पाया जाता है। मगर दोनों  शख्सियत एक ही हैं।
     अमर स्वतन्त्रता सेनानी नेताजी सुभाष चंद्र बोस की ‘आजाद हिंद सेना’ के मेजर दुर्गा मल्ल एक ऐसे प्रथम गोरखा स्वतंत्रता सेनानी थे, जिनकी मूर्ति गत् 27 मार्च, 2003 के दिन तत्कालीन  राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम के कर कमलों द्वारा  देश के संसद परिसर में स्थापित किया गया है।
    दुर्गा मल्ल की बहादुरी और देशभक्ति के जज्बे को उजागर  करने वाला एक यादगार वाकया कुछ इस  तरह है–
     जब वे अंग्रेज  सरकार  के द्वारा बंदी बनाए जाने के बाद, उन्हें फांसी की सजा सुना दी गई थी तब एक दिन अंग्रेज सरकार  की तरफ से उनको यह प्रस्ताव उनकी पत्नी के मार्फत भेजा गया, यदि अंग्रेज सरकार के विरुद्ध लड़ने का अपराध किया है ऐसा मानकर  वे  माफीनामा लिखकर देते हैं तो उनकी फांसी की सजा को रद्द की जा सकती है। मगर अंग्रेजों के इस प्रस्ताव  को सुनकर उनका दो टूक जवाब यह था कि “हमारे नेता जी ने ऐसा करना नहीं सिखाया, हमें ऐसा करने का प्रशिक्षण नहीं मिला है।” इस तरह उन्होंने देश के लिए प्राण की आहुति देना स्वीकार किया पर झुकना स्वीकार नहीं किया। उन्होंने फांसी को गले लगाया पर अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ने को हरगिज  देशद्रोह नहीं अपितु देशभक्ति माना। अपनी पत्नी शारदा मल्ल को समझाते और दिलासा देते हुए  यह भी कहा कि, “अब हमारे देश को आजाद होने में अंधिक देर नहीं है शारदा, जल्द ही हमारा देश आजाद  होगा।”   और देखिए  उनकी भविष्य वाणी कितनी सटिक निकली। फांसी के 3 साल  पूरे होते न होते 15 अगस्त 1947 को देश आजाद  हो गया। ऐसे जांबाज गोरखा सपूत को भूलना किसी अपराध से कम न होगा।
     यूं तो देश की आजादी की खातिर अपने प्राणों की आहुति देने वालों की संख्या अनगिनत हैं उन्हीं बलिदानों में  शहीद मेजर दुर्गा मल्ल का नाम प्रथम गोरखा स्वतंत्रता सेनानी के रूप ससम्मान लिया जाता है, लिया जाता रहेगा।
     आज उनके बलिदान को 82 वर्ष पूरे हो गए।  जगतभर के गोरखालियों एवं भारतीयों के लिए आज का दिन सचमुच गर्व का दिन है,उन्हें सादर स्मरण करने का पावन दिन है। हम सब उनके बलिदान को स्मरण करते हुए हार्दिक श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं…। वे हमेशा हम गोरखालियों के हृदय में बसे रहेंगे,साथ ही हम उनके अतुलनीय कर्तव्यनिष्ठा के प्रति ऋणी रहेंगे। वे हमारे लिए अमर आत्मा हैं, गोरखा गौरव हैं, उन्हें शत शत नमन…शत, शत नमन…एवं भावभीनी  श्रद्धांजलि।
  “जय हिंद
              जय गोरखा”
 – श्याम कुमार राई 
       ‘ सलुवावाला’

Leave a Comment

This site is protected by reCAPTCHA and the Google Privacy Policy and Terms of Service apply.

error: Content is protected !!