एक राजस्थान, दो पार्टी, तीन नेता और पंजाब में सत्ता की जंग

-राकेश दुबे

राजस्थान के पंजाब में दखल का दिलचस्प संयोग बना है। गुलाबचंद कटारिया पंजाब के राज्यपाल हैं, डॉ. सतीश पूनिया वहां बीजेपी के प्रभारी और सचिन पायलट पंजाब में कांग्रेस के प्रभारी। यानी पंजाब के संवैधानिक शीर्ष पद से लेकर राजनीतिक शीर्ष दलों, बीजेपी और कांग्रेस के चुनावी संगठन तक राजस्थान के तीन राजनीतिक चेहरों की अहम मौजूदगी। विधानसभा चुनाव से पहले राजस्थान के इन तीनों नेताओं की भूमिका एक साथ चर्चा में हैं। तीनों ने राजनीति को सिर्फ सत्ता के गलियारों से नहीं, सत्ता संघर्ष के अनुभवों से जाना है। तीनों 2018 में एक साथ राजस्थान विधानसभा के सदस्य भी रहे। अब वही अनुभव पंजाब की जमीन पर अलग-अलग तरीके से इस्तेमाल होना है।

राजभवन में बैठे राजस्थान के ‘भाई साहब’

पंजाब में गुलाबचंद कटारिया की भूमिका, डॉ पूनिया और पायलट से बिल्कुल अलग है। राज्यपाल सीधे राजनीतिक मुकाबले का हिस्सा नहीं होते। लेकिन पंजाब जैसे राजनीतिक रूप से संवेदनशील राज्य में सत्ता साधने और कमजोर बहुमत के वक्त राज्यपाल की भूमिका केवल औपचारिक नहीं रहती। सरकार और राजभवन के बीच संवैधानिक समन्वय, चुनाव से जुड़े संवैधानिक दायित्व और सरकार के गठन जैसी परिस्थितियों में राज्यपाल का पद सबसे महत्वपूर्ण हो जाता है। राजस्थान के पूर्व गृह मंत्री, विधानसभा में विपक्ष के नेता और प्रदेश में पार्टी के अध्यक्ष सहित बीजेपी के संगठनात्मक चेहरे रहे कटारिया ने सत्ता और विपक्ष दोनों को बहुत करीब से देखा है। असम के राज्यपाल रहने के बाद जुलाई 2024 में उन्होंने पंजाब के राज्यपाल और चंडीगढ़ के प्रशासक का पद संभाला। पंजाब में उनकी मौजूदगी इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि वे बीजेपी के रणनीतिकार एवं केंद्रीय अमित शाह के खास आदमी माने जाते हैं तथा चुनावी राजनीति से बाहर होकर भी राज्य की राजनीतिक व संवैधानिक व्यवस्था के महत्वपूर्ण संस्थान के नेतृत्वकर्ता हैं।

पूनिया और पायलट: दोनों की मुश्किल अलग

राजनीति का असली मैदान डॉ. पूनिया और पायलट के सामने है। दोनों अपनी-अपनी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष रहे और दोनों जिताने – हराने की रणनीति के खिलाड़ी हैं। वरिष्ठ पत्रकार अरविंद चोटिया के मुताबिक पायलट उप मुख्यमंत्री रहे, उसी दौर में पूनिया उप नेता प्रतिपक्ष रहे। राजनीतिक वर्यवेक्षक त्रिभुवन के मुताबिक दिलचस्प यह भी है कि पायलट और पूनिया दोनों अपने-अपने राजनीतिक संसार में ‘एसपी’ के नाम से जाने जाते हैं। त्रिभुवन कहते हैं कि यह केवल दो नियुक्तियों की कहानी नहीं है। यह दो दलों की दो बिल्कुल अलग बीमारियों के इलाज के लिए भेजे गए दो चिकित्सकों की कहानी है। वे कहते हैं कि कांग्रेस के पास पंजाब में घर है, लेकिन चाबी के दावेदार बहुत हैं। बीजेपी के पास घर का नक्शा है, लेकिन नींव नहीं पड़ी। एक को घर बचाना है, दूसरे को घर बनाना है। राजनीतिक विश्लेषक निरंजन परिहार कहते हैं कि सचिन पायलट कांग्रेस की आंतरिक गुटबाजी, हाईकमान की अनिर्णयशीलता और प्रदेश नेतृत्व की कमजोरियों से खुद भी संघर्ष कर चुके हैं। इसलिए पायलट जानते हैं कि पार्टी के भीतर असंतोष से पैदा हुई समानांतर पार्टियों से कैसे निबटा जाता है।

पूनिया को पंजाब में पार्टी का पराक्रम दिखाना है

सिख पगड़ी धारण करके चुनावी समर में उतर चुके राज्यसभा सांसद डॉ सतीश पूनिया के लिए पंजाब बीजेपी की जिम्मेदारी एक बड़े संगठनात्मक परीक्षण की तरह है। अगस्त 2026 में उन्हें पंजाब बीजेपी का प्रभारी बनाया गया। हरियाणा में पार्टी के प्रभारी के तौर पर 2024 में बीजेपी की लगातार तीसरी जीत में उनकी भूमिका को पार्टी ने भी सराहा। राजनीतिक विश्लेषक निरंजन परिहार कहते हैं कि हरियाणा के मुकाबले पंजाब में पूनिया के सामने चुनौती बड़ी है। भले ही डॉ पूनिया ने कह दिया है कि बीजेपी पंजाब की सभी 117 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है। लेकिन फिलहाल 117 में से बीजेपी के केवल 2 विधायक ही हैं। परिहार कहते हैं कि बीते लोकसभा चुनाव में बीजेपी एक भी सांसद नहीं चुना गया, लेकिन वोट शेयर 19 प्रतिशत तक पहुंच गया। मतलब पंजाब का हर 5वां वोटर बीजेपी के साथ है। परिहार के मुताबिक पूनिया की असली परीक्षा इसी वोट को संगठन, स्वीकार्यता और विधानसभा सीटों में बदलने की है।

पायलट के सामने संगठन सहेजने की चुनौती

पायलट की चुनौती अलग है। कांग्रेस ने उन्हें उस पंजाब का प्रभारी बनाया है, जहां पार्टी के पास राजनीतिक आधार तो है, लेकिन संगठनात्मक एकजुटता बड़ी चुनौती है। राजनीतिक विश्लेषक निरंजन परिहार कहते हैं कि पायलट का संसदीय अनुभव अधिक है और चुनावी राजनीति में उनकी राष्ट्रीय पहचान भी बड़ी है। राजस्थान में प्रदेश अध्यक्ष के नाते उनको अपनी पार्टी को सत्ता करीब ले जाने जितना बहुमत लाने का भी अनुभव रहा है। लेकिन वरिष्ठ पत्रकार अरविंद चोटिया कहते हैं कि पंजाब में सचिन पायलट के सामने सबसे बड़ी चुनौती होगी मेंढ़कों को तौलना। चोटिया कहते हैं कि यह काम बहुत मुश्किल है, शायद बहुत ज्यादा मुश्किल है। क्योंकि पायलट के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या वे पंजाब में कांग्रेस के बिखरे हुए संगठन, नेताओं की आपसी खींचातान और खेमेबाजी के खत्म करके संगठन को चुनावी मशीन में बदल पाएंगे?

दोनों की मंजिल एक, रास्ते बिल्कुल अलग

यहीं पंजाब की आगामी राजनीति दिलचस्प हो जाती है। डॉ पूनिया को पंजाब में एक ऐसी बीजेपी को विस्तार देना है जो वहां अभी सत्ता की स्वाभाविक दावेदार नहीं है, जबकि पायलट को ऐसी कांग्रेस को एकजुट करना है जिसके पास इतिहास और जनाधार तो है, लेकिन संगठनात्मक अंतर्विरोध भी कम नहीं हैं। राजनीतिक विश्लेषक निरंजन परिहार कहते हैं कि इस लिहाज से अगला पंजाब विधानसभा चुनाव दोनों नेताओं के लिए केवल एक और चुनाव नहीं होगा, यह उनकी राजनीतिक रणनीति, संगठन क्षमता और नेतृत्व की प्रतिष्ठा का इम्तिहान भी होगा। वरिष्ठ राजनीतिक पत्रकार विजय विद्रोही कहते हैं कि बीजेपी पंजाब में अपना आधार विस्तार करना चाहती है और कांग्रेस अपने पुराने जनाधार को फिर से राजनीतिक ताकत में बदलना चाहती है। विद्रोही कहते हैं कि पायलट और डॉ पूनिया, दोनों के सामने फिलहाल आम आदमी पार्टी की सत्ता की ताकत तको तोड़ने और अपनी अपनी पार्टियों की राजनीतिक जमीन के पुनर्गठन का भी है।

पंजाब पर राजस्थान का सियासी पहरा

पंजाब की राजनीति में कटारिया, पूनिया और पायलट की यह मौजूदगी अपने आप में असाधारण राजनीतिक तस्वीर है। कटारिया के सामने राजभवन की रवायतों की गरिमा में रहने की मर्यादा है, पूनिया के सामने बीजेपी को विस्तार देने की चुनौती और पायलट के सामने कांग्रेस को चुनावी ताकत बनाने की कसौटी। तीनों का अनुभव, संगठन की राजनीतिक धार और अपनी-अपनी भूमिका है, लेकिन तीनों अलग अलग हैं। सवाल अब सिर्फ इतना है कि पंजाब की जनता पायलट और पूनिया में से किसकी मेहनत को स्वीकार करती है। और सवाल यह भी है कि अंत में अगर विधानसभा में बहुमत का मामला संवैधानिक संकट में उलझ गया, तो राज्यपाल के रूप में गुलाबचंद कटारिया पंजाब में किस दल को दल-दल से निकालकर सत्ता सौंपते हैं, यह देखना भी महत्वपूर्ण होगा। लेकिन खास बात यही है कि कभी राजस्थान विधानसभा में साथ बैठने वाले तीनों नेता आज तीन अलग-अलग भूमिकाओं में पंजाब की सियासत के अहम किरदार हैं।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, एवं ‘जनसत्ता’ में दो दशक वरिष्ठ पदों पर रहे हैं)

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