भारतीय पर्यावरणीय चेतना को प्रशासनिक शब्दावली में भी मिले सांस्कृतिक स्वरूप देने का सुझाव

अजमेर, 15 सितम्बर। महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय, अजमेर के कुलगुरु प्रो. सुरेश कुमार अग्रवाल ने भारत सरकार के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय को एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक-भाषायी सुझाव देते हुए ‘Indian Forest Department’ के स्थान पर ‘Bharatiya Aranya Vibhag’ (भारतीय अरण्य विभाग) नाम अपनाने पर विचार करने का आग्रह किया है।
कुलगुरु ने पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के सचिव श्री तन्मय कुमार, आईएएस को लिखे पत्र में कहा है कि ‘Forest’ शब्द प्रशासनिक और पारिस्थितिक दृष्टि से भले ही सटीक हो, लेकिन भारतीय सभ्यता में ‘अरण्य’ शब्द का अर्थ इससे कहीं अधिक व्यापक और गहरा है। अरण्य केवल वृक्षों से आच्छादित भू-भाग अथवा प्राकृतिक संसाधनों का क्षेत्र नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान परंपरा में अध्ययन, चिंतन, सह-अस्तित्व, साधना और पुनर्सृजन का जीवंत केंद्र रहा है।
प्रो. अग्रवाल ने कहा कि भारतीय सभ्यता में अरण्य की अवधारणा अत्यंत प्राचीन है। आरण्यक ग्रंथों, ऋषियों के वन आश्रमों, वनवास की परंपरा तथा वृक्षों, नदियों, पशु-पक्षियों और समस्त जीव-जगत के प्रति सम्मान में प्रकृति के साथ भारतीय समाज के संबंध की विशिष्ट दृष्टि दिखाई देती है। इस दृष्टिकोण में प्रकृति केवल प्रबंधन अथवा उपयोग की वस्तु नहीं, बल्कि मनुष्य के साथ धर्म, कर्तव्य और पारस्परिक उत्तरदायित्व के संबंध में जुड़ी हुई है।
उन्होंने पत्र में कहा कि ‘भारतीय अरण्य विभाग’ शब्दावली पारिस्थितिकी और नैतिकता, संरक्षण और संस्कृति तथा पर्यावरण और आध्यात्मिक चेतना को एक साथ अभिव्यक्त कर सकती है। यह नाम भारतीय ज्ञान प्रणालियों और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की उस व्यापक भावना के साथ भी सामंजस्य स्थापित करता है, जिसमें समस्त प्रकृति को जीवन की साझी विरासत के रूप में देखा गया है।
कुलगुरु ने स्पष्ट किया कि यह सुझाव केवल प्रशासनिक नाम परिवर्तन का प्रस्ताव नहीं है, बल्कि इस बात पर विमर्श की आवश्यकता को रेखांकित करता है कि क्या भारत की आधिकारिक शब्दावली उसके अपने पारंपरिक पर्यावरणीय दृष्टिकोण को अधिक प्रभावी ढंग से अभिव्यक्त कर सकती है। उन्होंने कहा कि आज जब भारत आधुनिक पर्यावरण विज्ञान को अपनी समृद्ध स्वदेशी एवं पारंपरिक पारिस्थितिक समझ के साथ जोड़ने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, तब ‘अरण्य’ जैसी भारतीय अवधारणा इस समन्वय को अधिक सार्थक अभिव्यक्ति दे सकती है।
उन्होंने मंत्रालय से आग्रह किया कि इस विचार को पर्यावरणविदों, वन प्रशासन के अधिकारियों, शिक्षाविदों, भारतीय ज्ञान परंपरा के विशेषज्ञों और अन्य संबंधित पक्षों के बीच व्यापक विमर्श के लिए विषय के रूप में विचार किया जाए।
प्रो. अग्रवाल ने अपने पत्र में कहा कि ‘अरण्य’ शब्द भारतीय पर्यावरणीय स्मृति और सभ्यतागत चेतना को अपने भीतर समेटे हुए है। ऐसे में ‘भारतीय अरण्य विभाग’ केवल एक नया नाम नहीं, बल्कि भारत के प्रकृति-दर्शन और आधुनिक वन संरक्षण व्यवस्था के बीच एक वैचारिक सेतु के रूप में देखा जा सकता है।