*लोकतंत्र की हार या सत्ता की जीत*

जनता ने बदलाव की नींव रखी  लोगों ने अपने मत के माध्यम से एक नई दिशा और बेहतर व्यवस्था की उम्मीद जताई थी। लेकिन जब लोकतांत्रिक और संवैधानिक व्यवस्था पर साम-दाम, दंड-भेद और छल-कपट भारी पड़े, ओरसवाल खड़े होने लगें, तो सबसे बड़ा प्रश्न यही होता है—*क्या सत्ता हासिल करना ही राजनीति का अंतिम उद्देश्य रह गया है?* लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने का नाम नहीं है। *लोकतंत्र जनता की इच्छा, संविधान की मर्यादा, पारदर्शिता और जनहित के प्रति जवाबदेही का नाम है।* चुनाव में जनता का मत ही सर्वोच्च आधार होता है और स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव लोकतांत्रिक व्यवस्था की महत्वपूर्ण नींव हैं। राजनीति का उद्देश्य सत्ता प्राप्त करना हो सकता है, लेकिन जनकल्याण की कीमत पर सत्ता प्राप्त करना लोकतांत्रिक मूल्यों के सामने गंभीर सवाल खड़े करता है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि राजनीतिक दल और जनप्रतिनिधि सत्ता से पहले संविधान, लोकतांत्रिक मर्यादाओं और जनता के विश्वास को महत्व दें।
क्योंकि *लोकतंत्र में जीत केवल किसी दल या व्यक्ति की नहीं होती—जीत हमेशा जनता के विश्वास और लोकतांत्रिक मूल्यों की होनी चाहिए।*
*आवाज-ए-कलम*
*अधिवक्ता के.सी.जोनवाल*

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