पोस्टमार्टम की रिपोर्ट कहती है कि लोकतंत्र की मौत अचानक नहीं हुई ,
उसे धीरे-धीरे मारा गया ,
पहले उसके वोट खरीदे गए, फिर उसके प्रतिनिधि,
पहले उसके सवाल मारे गए, फिर उसकी आवाज .
लेकिन उसकी सांस तब भी चल रही थी जब वोट पैसों से मिल रहे थे ,
उसकी नब्ज तब भी मिल रही थी जब विधायक पार्टी बदल रहे थे ,
अरे मौत तो तब हुई जब जनता की उंगली पर लगी स्याही से ज्यादा एक बंद कमरे की सौदेबाजी की कीमत हो गई ,
अजीब बात है कल तक जो भ्रष्टाचारी थे ,
आज सत्ता का श्रृंगार हो गए ,
कल तक जो व्यवस्था के लिए बीमारी थे ,
आज नैतिकता का अवतार हो गए ,
भाई ना काशी , ना बनारस , ना पटना, ना हरिद्वार में हैं….
लगता है असल गंगा तो बहती सत्ता के गलियारों में है ,
और उसमें डुबकी लगाते ही सब आरोप साफ हो जाते हैं,
चोरी – डकैती छोड़ो, कत्ल भी माफ हो जाते हैं ,
पर असल सवाल यह है कि क्या अभियुक्त सचमुच बदल गए हैं,
या सिर्फ झंडा बदला है और उनके इल्जाम खुद व खुद धुल गए हैं .
भविष्य में लोकतंत्र के इस शब्द की फाइल को जब भी उठाया जाएगा…
मौत का कारण सिर्फ एक शब्द बताया जाएगा —-
नीलामी
राजीव शर्मा