*किसी देश/ समाज /परिवार में गाली अथवा भाषाई अभद्रता उस देश /परिवार/ समाज के मुखिया के चरित्र पर बड़ा प्रश्न चिन्ह लगाती है।* *मुखिया का कार्य पालन-पोषण या नीति -नियामक भर का नहीं होता। वह अपने आस- पास का परिवेश निर्मित करता है। संबद्ध समाज/परिवार की पहचान गढ़ता है। समाज उसका अनुसरण करता है। *
*भारत के संदर्भ में हर काल खंड में नियामक-नायक के चरित्र से तात्कालिक समाज के आचरण व्याख्यायित होते रहे हैं। मसलन, गांधी-नेहरू युग के निज चरित्र के चलते अंग्रेजों से आजादी लेने के बाद भी उनके प्रति किसी तरह की कोई सार्वजनिक नफरत नहीं थी। सांप्रदायिकता अंधड़ में सद्भाव का दीपक अपनी पूरी लौ के साथ जलता रहता था।*
*इंदिरा गांधी के समय में देशज राष्ट्रवाद और शासकीय तानाशाही का दंभ समाज में प्रवाहित हुआ था। राजीव गांधी की धर्म, जाति, अधिकारों की हुँकार ने देश को सांप्रदायिक ध्रुवीकरण दिया, जिसका परिणाम मंडल – कमण्डल बनकर समाज के भाषाई सरोकारों में घुलने लगा।*
*नरसिंह राव से लेकर अटल बिहारी तक समाज आर्थिकी के इर्द गिर्द अपने आप को बुन रहा था। मनमोहन सिंह की सरलता में अतिवाद- अराजकता को खुली जमीन मिली, तदनुरूप समाज में अराजक तत्वों को महत्व मिलने लगा.. .. *
*और उसके बाद मिली नई आजादी में तो नफरत की लहलहाती फसल ने अपना धान खुद उगाना शुरू कर ही दिया था ..। यह आजादी मंदिर-मस्जिद, गोधरा गुजरात, पाकिस्तान और काश्मीर के रास्ते आई थी ..इसलिए अधिक आकर्षक और आत्मीय थी।*
*यही से एक नई भाषा ईजाद हुई। एक पूरी पीढ़ी, पाकिस्तान चले जाओ, गद्दार, नक्सल, देशद्रोही, राम जादे – हराम जादे, मौत का सौदागर, पप्पू, फेंकू, सुनते-सुनते जवान हो गई । अब वह पीढ़ी, ना केवल यह जुबान बोल रही है, बल्कि समझ भी उसी भाषा को रही है.. पिछले दिनों हुए आंदोलनों में जेन जी की भाषा हो या किसी राष्ट्रीय दल के प्रचार तंत्र में आक्रोशित अपशब्द… सब उसी फसल की देन है, जिसे धर्म, राष्ट्रवाद और पूंजी की खाद डालकर छप्पन इंची सीने से सींचा गया है।*
*आप दिखाते रहिए अपनी चोट..! खेलते रहिए विक्टिम कार्ड। अब जो बोया है, वही काटना है ..समाज को अभी और बंटना है और बांटना है। यह और बात है कि इसकी कीमत पीढ़ियों को, भाषा को भुगतनी होंगी।*
*रास बिहारी गौड़*