
नवस्वरूप की अर्चना साधना का पर्व आज से शुरु, घर व मंदिरो मे होगी घट स्थापना
ब्यावर, (हेमन्त साहू)। नवरात्रि वर्ष में दो बार मनाया जाने वाला एक मात्र धार्मिक उत्सव है। एक नवरात्रि गर्मी की शुरूआत पर चैत्र में, तो दूसरा शीत की शुरूआत पर आश्विन माह में। गर्मी और जाड़े के मौसम में सौर-ऊर्जा हमें सबसे अधिक प्रभावित करती है। क्योंकि फसल पकने, वर्षा जल के लिए बादल संघनित होने, ठंड से राहत देने आदि जैसे जीवनोपयोगी कार्य इस दौरान संपन्न होते हैं। इसलिए पवित्र शक्तियों की आराधना करने के लिए यह समय सबसे अच्छा माना जाता है।
प्रकृति में बदलाव के कारण हमारे तन-मन और मस्तिष्क में भी बदलाव आते हैं। इसलिए शारीरिक और मानसिक संतुलन बनाए रखने के लिए हम उपवास रखकर शक्ति की पूजा करते हैं। एक बार इसे सत्य और धर्म की जीत के रूप में मनाया जाता है, वहीं दूसरी बार इसे भगवान श्रीराम के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। कुल मिलकर नवरात्री का का पर्व वास्तव में मातृशक्ति की साधना का पर्व है, नवजागरण का पर्व है। शहर के कई माता के मंदिरो सहित अनैक देवस्थानो तथा घर, प्रतिष्ठानो मे नवरात्रि स्थापना के तहत घट स्थापना की जाएगी। माताजी की डुंगरी, आशापुरामाता धाम,सुरजपोल गेट बाहर महा काली मंदिर सहित अनैक मंदिरो मे विशेष पुजा अर्चना के कार्यक्रम नो दिनो तक होंगे। मंदिरो एवं कई स्थानो पर माता की आराधना व जयकारो की गुंज रहेगी।
जीवन का प्रवाह, हमारी प्राणशक्ति:- मातृशक्ति का भारतीय संस्कृति में सर्वोच्च महत्व है। जीवन का प्रवाह, हमारी प्राणशक्ति का स्नोत मातृशक्ति ही है। ब्रह्मांड के हर तत्व में निहित व हर तत्व की सृजनकर्ता मातृशक्ति ही है। इसलिए हिंदू धर्म के अनुसार मातृशक्ति को सच्चिदानंदमय ब्रह्मस्वरूप भी कहा गया है। इसके बिना किसी भी ईश्वरीय तत्व का उद्भव ही संभव नहीं है। मातृशक्ति को आद्यशक्ति भी कहा गया है।
मां भगवती के नवस्वरूप की अर्चना साधना का पर्व है, मां भगवती का हर स्वरूप अध्यात्म के मूल तत्वों- ज्ञान,सेवा, पराक्रम, समृद्धि, परमानंद, त्याग, ध्यान और सृजन शक्ति का अवतरण है। मातृशक्ति के चार स्वरूप-गीता, गंगा, गायत्री और गौ माता हैं। आद्यशक्ति मां भगवती की साधना को जीवन में धारण कर मनुष्य अपनी क्षुद्रताओं से परे जाकर अपने इष्ट के देवत्व से एकाकार कर सकता है।
मनुष्य की कोई भी सोच जो समाज में भेद पैदा करे, मनुष्य को मनुष्य से दूर करे चाहे वह भाषावाद, प्रांतवाद और जातिवाद की ही बात क्यों न हो, उसे पनपने नहीं देना चाहिए। हम सभी आद्यशक्ति मां भगवती की संतान हैं। हम सभी में एक ही चेतना है, एक ही प्राण हैं।

उपवास हमारी आत्मिक शुद्धि करते है:- उप का अर्थ है निकट और वास का अर्थ है निवास। अर्थात ईश्वर से निकटता बढ़ाना। कुल मिलाकर यह माना जाता है कि उपवास के माध्यम से हम ईश्वर (मां) को अपने मन में ग्रहण करते हैं, मन में ईश्वर का वास हो जाता है। लोग यह भी मानते हैं कि आज की परिस्थितियों में उपवास के बहाने हम अपनी आत्मिक शुद्धि भी कर सकते हैं, अपनी जीवनशैली में सुधार ला सकते हैं। हिन्दू धर्म में या (शास्त्रों के अनुसार) उपवास का सीधा-सा अर्थ है आध्यात्मिक आनंद की प्राप्ति के लिए अपनी भौतिक आवश्यकताओं का परित्याग करना। सामान्यत: भाषा में बात करें .. तो भोजन (खाना) लेने से हमारी इंन्द्रियां तृप्त हो जाती हैं और मन पर तन्द्रा तारी होती है। कम मात्रा में भोजन करके या फलाहार करके हम इन्द्रियों को नियंत्रित करना सीखते हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार भी जब आपका पेट भरा होता है तो आपकी बुद्धि सो जाती है, विवेक मौन हो जाता है।
नवरात्री से मिलती है मानवता की सीख:- हमारे किसी भी भेद से कष्ट मां भगवती को ही होगा। ऐसा इसलिए, क्योंकि उसने हमें इस पावन धरा पर आपसी प्रेम व भाईचारे का अनुपम संदेश हर जगह फैलाने के लिए भेजा है। यही संगठन साधना है और राष्ट्र साधना है। मनुष्य को सही मायने में मनुष्य बनाने के लिए किया गया सर्वोत्तम प्रयास है। नवरात्र में हम एक बार पुन: नव-ऊर्जा से परिपूरित होकर भारतीय जनमानस के लिए कुछ कर सकें, तो समाज का कल्याण निश्चित है। मां भगवती का दिव्य संदेश भी यही सीख प्रत्येक धर्म, समाज और क्षेत्र के लिए है।
शहर के कई क्षैत्रो मे नवरात्रि के उपलक्ष मे गुरुवार से गरबा रास के कार्यक्रम होंगे। कई युवा मन पारम्परिक वेषभुषा व आधुनिक परिधान मे संगीत की थाप पर डांडिया नृत्य करेंगे। अखिल भारतीय जैन विद्यार्थी परिषद द्वारा 29 सितम्बर को मेवाडी गेट बाहर रांकाजी की बगीची मे गरबा रास डांडिया महोत्सव का आयोजन होगा। गरबा कार्यक्रम मे सेलीब्रेटी के रुप मे राजस्थानी स्टार उषा जैन भाग लेगी। कार्यक्रम की तैयारियो को लेकर संगठन अध्यक्ष मोहित कांठेड, मनीष जांगडा, प्रवीण मकाणा, सौरभ बाबेल, श्रेयांश कांकरिया, राहुल वर्मा, केशव झंवर, प्रियंका गादिया, वर्षा जैन आदि जुटे हुए है।