इंसानियत का पहला धर्म मर्यादा है

केकड़ी:-सरल,सहज जीवन आनंद का स्रोत है और जीवन जीने का आनंद मर्यादा में है। इंसानियत का पहला धर्म भी मर्यादा बताया गया है।उक्त उद्गार संत अशोक ने अजमेर रोड स्थित संत निरंकारी सत्संग भवन पर सत्संग के दौरान व्यक्त किए।
मंडल प्रवक्ता राम चंद टहलानी के अनुसार संत अशोक ने कहा कि अगर इंसान का मन संसार में है तो उसका प्रभु परमात्मा से जुड़ाव नहीं होगा।आत्मा का मूल परमात्मा है उससे जुड़ने पर ही सफलता मिलती है।इंसान को सनातन सत्य परमात्मा से जुड़ना होगा।सत्संग में संतों महापुरुषों के वचनों को अपनाना होगा परमात्मा कण कण में है,क्या इसकी हम अनुभूति कर पा रहे हैं, क्या इसके दर्शन दीदार हो रहे हैं अगर हां तो इस अवस्था का नाम ही मुक्ति है।
इंसान का मन घोड़े के समान है यह पल-पल दौड़ता रहता है इस पर लगाम लगाना बहुत जरूरी है परमात्मा के ज्ञान को,सतगुरु के वचनों को एक मन चित होकर, स्वीकार कर इस पर लगाम लगाई जा सकती है।
हे इंसान संसार के माया जाल में गलतान होकर जीवन व्यर्थ न गुजार जीवन के कुछ पल परमात्मा के नाम का सिमरन करके परम आनंद को प्राप्त करके जीवन को खुशहाल बना।
आज इंसान अगर परमात्मा की भक्ति कर रहा है तो वही उसका असल घर है जिस प्रकार उबलते पानी में अपना चेहरा देख नहीं पाते हैं ठीक उसी के प्रकार इंसान को क्रोध में कुछ भी दिखाई नहीं देता है वह तो क्रोध की अग्नि में स्वयं भी जलता है औरों को भी जलाता है।इंसान ज्ञान से शीतलता धारण करता है रिश्तों की सुंदरता मर्यादा में है और इसकी शुरुआत अपने घर से होनी चाहिए फिर दूसरों से अपेक्षा रखनी चाहिए क्योंकि मर्यादा में ही सारी कायनात का सुख छुपा हुआ रहता है जीवन में अगर सुखी रहना है और खुशियां प्राप्त करनी है तो मर्यादा में ही रहना होगा।
सत्संग के दौरान अंजू,समृद्धि, गोपाल,रोहित,माया,शीतल,रेशमा, गुड्डू,रेनू,चांदनी उमेंश,आदी ने गीत,विचार और भजन प्रस्तुत किये संचालन संगीता टहलानी ने किया।

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