*’भूख’और ‘जरुरत’ की परिधी पर नाच रही है राजनीति*

*’भूख’..वह भी पेट की..ना होने वाले काम भी करा देती है,यह बात सभी प्राणियों पर लागू होती है..चाहे वह इंसान हो या जानवर।यह बात न ई नहीं है जो मैं कह रहा हूं..आप और हम सभी इस बात से वाकिफ हैं।’भूख’ का भाव दुनिया के हर प्राणी मात्र में,हर देश विदेश में,हर जाति धर्म और सम्प्रदाय में एक समान होता है।अभी रमजान का महिना चल रहा है,जहां मालिक का हर नेक बंदा अपनी दुआ में इस बात का जिक्र जरुर करता है कि मालिक भूखा उठा देना पर किसी को भूखा सुलाना मत।चाहे नवरात्रा की पूजा हो या सिखों के भंडारे का जिक्र..जहां दुआ में पेट की भूख मिटाये जाने का जिक्र जरुर आता है।रब सबको रोटी दे..अपनी अपनी दुआओं में यह नेकी सभी बांटते हैं।कहने की आवश्यकता नहीं कि पेट की भूख हर प्राणी मात्र के लिए बर्दाश्त से बाहर है।ऐसे में कौन मालिक का बंदा भूखे का निवाला छीनकर बदनियत का राह गुजर होना चाहेगा…वह भी इस घोर संकट की घडी में..जहां मौत हर घर की दहलीज पर खडी हो।*
*मेरे पाठक सोच रहे होंगे..आज मैं यह जिक्र क्यूं लेकर बैठा हूं..❓यहां मैं आगे अपनी बात कहने से पहले यह बता देना चाहता हूं कि ‘कोरोना वायरस’ से पैदा हुए संकट के दौरान लोगों को जितनी तकलीफ बीमारी के वायरस ने नहीं दी,उससे कहीं अधिक तकलीफ देश में यकायक जागी राजनीति ने दी है।इस कोरोना को लेकर देश प्रदेश की राजनीति व राजनेता गुथम गुथ्था उलझते से नजर आने लगे हैं।बीमारी को सरकारी मुलाजिमों के गले में डाल सभी ने राजनीति के लिए खूब समय और अवसर जुटा लिया है।यह तो चर्चा हुई समूचे देश की।इसे यहीं विराम देते अब मैं जिक्र छेड रहा हूं..अपने शहर किशनगढ का…राजनीति का सैलाब यहां भी कम नहीं।संकट की घडी में ‘भूख’ और ‘जरुरत’ दो बांते राजनीति के अखाडे में यहां इस कदर उतरी है कि कब जरुरतमंद का निवाला उससे छिन जाये..इस बात का कोई पता नहीं..ऐसी टांग खिंचाई बद् दस्तूर जारी है।बहरहाल सब यह जानते हुए भी बद्नियती पर उतारु हैं कि ‘भूखे’ को रोटी और ‘प्यासे’ को पानी पिलाना शुरु से ही हमारे देश के सांस्कृतिक मूल्यों की अवधारणा रही है।*

सर्वेश्वर शर्मा
संपादक_ *कुछ अलग*
मो. *9352489097*

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