वंदे मातरम गीत प्रतियोगिता के पुरस्कार दिए

मातृभूमि के प्रति कृतज्ञता का गान है वंदे मातरम  – हनुमान सिंह राठौड़
अंग्रेजों द्वारा 1905 में किए बंगाल विभाजन के विरोध में हुए बंग भंग आंदोलन के समय उठा वंदे मातरम का उदघोष भारत की स्वतंत्रता का मूल मंत्र बन गया था। स्कूल से निकालने, बेंत से मारने पर भी भारत का युवा डरा नहीं और वंदे मातरम गाते हुए आजादी के संघर्ष में कूद गया। हाथ में गीता और जिह्वा पर वंदे मातरम् का घोष करते हुए क्रांतिकारी फांसी पर झूल गए। राष्ट्रगीत वंदे मातरम हमारी वीर भोग्या वसुंधरा के पुत्रों की असीम शक्ति और वेदोक्त धरती माता के प्रति कृतज्ञता की ही भावपूर्ण अभिव्यक्ति है। स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि अन्य सभी देवी देवताओं को भूल जाओ और केवल भारत माताकी उपासना करो। वंदे मातरम गीत आज बच्चों को श्रेष्ठ पद प्राप्त करते हुए सुयोग्य नागरिक बनकर भारत के प्रति समर्पण का भाव सिखाता है।
यह बात अखिल भारतीय साहित्य परिषद अजमेर द्वारा 24 अप्रैल को होकरा उमा विद्यालय में वंदे मातरम् गीत प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता के पुरस्कार वितरण समारोह में मुख्य वक्ता आरएसएस क्षेत्रीय कार्यकारिणी सदस्य एवं संस्कृति विचारक हनुमान सिंह राठौड़ ने कही। क्षेत्रीय उपाध्यक्ष एवं साहित्यकार उमेश कुमार चौरसिया ने आजादी के संघर्ष में वंदे मातरम कहते हुए आत्मबलिदान करने वाले बाल वीरों की कहानी सुनते हुए देश के लिए त्याग भाव की प्रेरणा दी। विशिष्ट अतिथि विभाग संयोजक कुलदीप सिंह रत्नू रहे, अध्यक्षता प्राचार्य लोकेश अग्रवाल ने की तथा संचालन विष्णु दत्त शर्मा ने किया।
परिषद अध्यक्ष डॉ कृष्णकुमार शर्मा ने बताया कि गंगाधर शर्मा व बनवारीलाल शर्मा की देखरेख में हुई इस प्रतियोगिता में प्रथम सुनील रावत, द्वितीय पायल रावत और तृतीय करिश्मा व आरती रावत रहे, जिन्हें अतिथियों द्वारा आनंदमठ, स्वतंत्रता संग्राम की वीरांगनाएं, लक्ष्य की ओर आदि पुस्तके और उपहार से पुरस्कृत किया गया। शारदा स्तुति से आरम्भ हुआ कार्यक्रम सुमधुर वंदे मातरम गायन के साथ पूर्ण हुआ। विद्यालय के सतीश यादव,महेन्द्र सामरिया,स्काउट व गाइड राहुल, नितिक, हरीश, सपना, सुनीता सेन, लक्ष्मी और प्रीति का विशेष सहयोग रहा।
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