भारतीय ज्ञान परंपरा को शिक्षा का आधार बनाकर ही विकसित होगा आत्मनिर्भर भारत

प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा आधुनिक विज्ञान, नवाचार और वैश्विक शिक्षा की सशक्त आधारशिला : प्रो. भगवती प्रकाश शर्मा

अजमेर, राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के अनुरूप उच्च शिक्षा में भारतीय ज्ञान परंपरा (Indian Knowledge Systems-IKS) के समावेशन तथा शिक्षण की गुणवत्ता को नई दिशा देने के उद्देश्य से यूजीसी मालवीय मिशन शिक्षक प्रशिक्षण केंद्र (MMTTC), महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय, अजमेर एवं आर्यभट्ट इंटरनेशनल कॉलेज ऑफ टेक्निकल एजुकेशन, अजमेर के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित आठ दिवसीय ऑनलाइन संकाय विकास कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ। उद्घाटन सत्र में देशभर के विभिन्न राज्यों से बड़ी संख्या में शिक्षकों एवं शिक्षाविदों ने सहभागिता करते हुए भारतीय ज्ञान परंपरा आधारित शिक्षा के विविध आयामों पर गंभीर विमर्श किया।

कार्यक्रम के मुख्य वक्ता, प्रख्यात स्वदेशी चिंतक, शिक्षाविद एवं भारतीय ज्ञान परंपरा के विद्वान प्रो. भगवती प्रकाश शर्मा ने कहा कि भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा केवल सांस्कृतिक विरासत नहीं, बल्कि विज्ञान, प्रौद्योगिकी, गणित, धातु विज्ञान, अर्थशास्त्र, शासन व्यवस्था, खगोल विज्ञान तथा समाज विज्ञान सहित अनेक विषयों का समृद्ध ज्ञानकोष है। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा का अध्ययन पूर्वाग्रहों या औपनिवेशिक दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि वैज्ञानिक प्रमाणों, अनुसंधान और समकालीन संदर्भों के साथ किया जाना चाहिए।

उन्होंने शिक्षकों का आह्वान किया कि वे भारतीय ज्ञान परंपरा को केवल इतिहास का विषय न मानकर उसे अपनी कक्षाओं, शोध तथा पाठ्यक्रमों का अभिन्न अंग बनाएं। उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी को अपनी बौद्धिक विरासत से परिचित कराना समय की आवश्यकता है, जिससे शिक्षा में आत्मविश्वास, नवाचार और मौलिक चिंतन का विकास हो सके। आधुनिक विज्ञान और भारतीय ज्ञान परंपरा के समन्वय से ही भविष्य की शिक्षा अधिक समग्र, मानवीय और वैश्विक बनेगी।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. सुरेश कुमार अग्रवाल ने भारतीय ज्ञान परंपरा को शिक्षा का समग्र एवं अंतर्विषयी स्वरूप बताते हुए कहा कि इसका उद्देश्य केवल ज्ञानार्जन नहीं, बल्कि बुद्धि और प्रज्ञा—दोनों का विकास करना है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 भारतीय शिक्षा व्यवस्था को उसकी मूल सांस्कृतिक एवं बौद्धिक जड़ों से पुनः जोड़ने का ऐतिहासिक अवसर प्रदान करती है।

कुलगुरु ने कहा कि शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रमों की वास्तविक सफलता तभी है जब उनका अनुभव कक्षाओं में नवाचार, अनुसंधान और प्रभावी शिक्षण के रूप में दिखाई दे। उन्होंने शिक्षकों से आह्वान किया कि वे भारतीय उदाहरणों, भारतीय अवधारणाओं और भारतीय दृष्टिकोण को अपने शिक्षण का स्वाभाविक हिस्सा बनाएं, ताकि विद्यार्थी विषय को स्थानीय संदर्भों में समझते हुए वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बन सकें।

उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालयों की जिम्मेदारी केवल डिग्री प्रदान करना नहीं, बल्कि ऐसे नागरिक तैयार करना है जो ज्ञान, संस्कार, अनुसंधान क्षमता और वैश्विक दृष्टि से समृद्ध हों।

कार्यक्रम के दौरान वक्ताओं ने इस बात पर बल दिया कि भारतीय ज्ञान परंपरा मूलतः बहुविषयी, समग्र और जीवनोपयोगी है, जिसमें ज्ञान, नैतिकता, विज्ञान, पर्यावरण, समाज और मानवीय मूल्यों का संतुलित समावेश है। विशेषज्ञों ने शिक्षकों से आग्रह किया कि वे विद्यार्थियों में आलोचनात्मक चिंतन, शोधपरक दृष्टिकोण तथा भारतीय बौद्धिक परंपरा के प्रति आत्मविश्वास विकसित करें।

कार्यक्रम का सफल समन्वयन यूजीसी-एमएमटीटीसी के निदेशक प्रो. शिव प्रसाद के निर्देशन में किया गया। उन्होंने बताया कि मालवीय मिशन शिक्षक प्रशिक्षण केंद्र द्वारा समय-समय पर राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के प्रभावी क्रियान्वयन, भारतीय ज्ञान परंपरा, नवाचार, अनुसंधान संस्कृति तथा गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से विभिन्न संकाय विकास कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। इन कार्यक्रमों के माध्यम से शिक्षकों की शैक्षणिक क्षमता, नवाचार आधारित शिक्षण कौशल और शोध अभिरुचि को सुदृढ़ बनाया जा रहा है।

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