‘राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान हमारी राष्ट्रीय चेतना के दो सशक्त स्वर’—प्रो. अग्रवाल

अजमेर, 11 अगस्त। महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय, अजमेर में भारत के 80वें स्वतंत्रता दिवस के उपलक्ष्य में आयोजित किए जा रहे सप्तदिवसीय स्वाधीनता दिवस समारोह के अंतर्गत मंगलवार को विश्वविद्यालय के संविधान पार्क में सामूहिक राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ एवं राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ का भावपूर्ण एवं गरिमापूर्ण गायन किया गया। विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. सुरेश कुमार अग्रवाल की अध्यक्षता में आयोजित इस कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के संकायाध्यक्ष, विभागाध्यक्ष, शिक्षक, अधिकारी, कर्मचारी, शोधार्थी, विद्यार्थी एवं अतिथि शिक्षक बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।

सामूहिक गायन के लिए सनातन धर्म महाविद्यालय, ब्यावर के संगीत महाविद्यालय से अधिष्ठाता प्रो. दुष्यंत त्रिपाठी के निर्देशन में विद्यार्थियों की टीम विशेष रूप से विश्वविद्यालय पहुंची। विद्यार्थियों द्वारा प्रस्तुत राष्ट्रगीत एवं राष्ट्रगान की सुमधुर प्रस्तुति ने पूरे संविधान पार्क को राष्ट्रभक्ति के भाव से भर दिया।

इस अवसर पर कुलगुरु प्रो. सुरेश कुमार अग्रवाल ने कहा कि विश्वविद्यालय ने इस वर्ष स्वतंत्रता दिवस समारोह को केवल एक दिन तक सीमित न रखते हुए सप्तदिवसीय समारोह के रूप में आयोजित करने का निर्णय लिया है, ताकि स्वतंत्रता के गौरव, उसके संघर्ष और राष्ट्र के प्रति हमारे दायित्वों को व्यापक रूप से स्मरण किया जा सके। उन्होंने कहा कि आज के कार्यक्रम के लिए ‘वंदे मातरम्’ और ‘जन गण मन’ का सामूहिक गायन इसलिए चुना गया है क्योंकि दोनों ही हमारी राष्ट्रीय चेतना के अत्यंत महत्वपूर्ण प्रतीक हैं।

‘वंदे मातरम्’ में निहित है मातृभूमि वंदन और राष्ट्रनिर्माण का भाव

कुलगुरु ने ‘वंदे मातरम्’ की ऐतिहासिक एवं वैचारिक पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालते हुए कहा कि बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित ‘वंदे मातरम्’ का प्रकाशन 1882 में हुआ और इसे बाद में उनके प्रसिद्ध उपन्यास आनंदमठ में स्थान मिला। उन्होंने कहा कि इस रचना में केवल मातृभूमि की स्तुति नहीं है, बल्कि इसमें राष्ट्रनिर्माण, त्याग, नेतृत्व और गुरु-शिष्य परंपरा का भी गहरा भाव निहित है।

उन्होंने कहा कि ‘वंदे मातरम्’ को पढ़ते अथवा गाते समय जब हम इसके अर्थ को अनुभव करते हैं तो मातृभूमि के प्रति श्रद्धा और संवेदना स्वतः जागृत होती है। ‘सुजलाम्, सुफलाम्’ जैसे शब्द भारतभूमि की समृद्धि, प्रकृति और जीवनदायिनी शक्ति का सजीव चित्र प्रस्तुत करते हैं। उन्होंने कहा कि 24 जनवरी 1950 को संविधान निर्माताओं द्वारा ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रगीत के रूप में स्वीकार किया जाना भारतीय राष्ट्रीय चेतना और मातृभूमि के प्रति सम्मान की गहरी भावना को अभिव्यक्त करता है।

प्रो. अग्रवाल ने कहा कि आनंदमठ में गुरु और शिष्य के माध्यम से राष्ट्रनिर्माण की जो अवधारणा सामने आती है, वह अत्यंत महत्वपूर्ण है। राष्ट्र निर्माण केवल किसी एक व्यक्ति का कार्य नहीं, बल्कि मार्गदर्शन, त्याग, अनुशासन और सामूहिक संकल्प से निर्मित होने वाली प्रक्रिया है।

‘जन गण मन’ भारत की एकता और सामूहिक राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक

कुलगुरु ने कहा कि यदि ‘वंदे मातरम्’ मातृभूमि के प्रति वंदन और समर्पण का प्रतीक है, तो ‘जन गण मन’ भारत की राष्ट्रीय एकता और सामूहिक चेतना का सशक्त स्वर है।

उन्होंने कहा कि ‘जन गण मन’ के शब्दों में भारत के नागरिकों की एकता की अवधारणा अत्यंत प्रभावशाली रूप में अभिव्यक्त होती है। हम सब एक जन हैं, एक गण के नागरिक हैं और राष्ट्र की शक्ति हमारी सामूहिक चेतना में निहित है। उन्होंने कहा कि ‘राष्ट्रगान’ और ‘राष्ट्रगीत’ की संज्ञाओं के पीछे भी भारतीय राष्ट्रीय जीवन की गहरी सांस्कृतिक एवं भावनात्मक परंपरा है। सामान्य अर्थ में गीत में भावाभिव्यक्ति की प्रधानता होती है, जबकि गान में सामूहिक आह्वान का भाव अधिक प्रमुख होता है।

उन्होंने कहा कि दोनों राष्ट्रीय प्रतीकों को साथ रखकर देखने पर भारतीय राष्ट्रभावना की व्यापक तस्वीर सामने आती है—एक ओर मातृभूमि के प्रति वंदन और समर्पण, तो दूसरी ओर राष्ट्र की एकता और सामूहिक राष्ट्रीय चेतना

स्वतंत्रता दिवस केवल उत्सव नहीं, आत्ममंथन और संकल्प का अवसर

प्रो. अग्रवाल ने विश्वविद्यालय परिवार का आह्वान करते हुए कहा कि स्वतंत्रता दिवस को केवल एक औपचारिक दिवस के रूप में नहीं मनाया जाना चाहिए। इन राष्ट्रीय प्रतीकों में निहित भावनाओं को अपने जीवन और कार्य में आत्मसात करना ही स्वतंत्रता दिवस की वास्तविक सार्थकता है।

उन्होंने कहा, “हमें यह विचार करना होगा कि मातृभूमि के लिए मैं क्या कर सकता हूं और देश के लिए मैं क्या कर सकता हूं। राष्ट्र के प्रति अपने दायित्व को समझना और उसे अपने आचरण में उतारना ही स्वतंत्रता दिवस का वास्तविक संदेश है।”

कुलगुरु ने सामूहिक गायन के लिए विद्यार्थियों की टीम भेजने पर सनातन धर्म महाविद्यालय, ब्यावर के संगीत महाविद्यालय के अधिष्ठाता प्रो. दुष्यंत त्रिपाठी के प्रति विशेष आभार व्यक्त किया। उन्होंने विद्यार्थियों की सुंदर प्रस्तुति की सराहना करते हुए उनके उज्ज्वल भविष्य की शुभकामनाएं दीं और कहा कि विश्वविद्यालय को समय-समय पर उनका सहयोग प्राप्त होता रहा है।

उन्होंने कहा कि ब्यावर से विद्यार्थियों का विश्वविद्यालय आकर इस राष्ट्रीय आयोजन में सहभागी बनना अपने आप में शिक्षण संस्थानों के बीच सहयोग, सांस्कृतिक समन्वय और राष्ट्रभावना के साझा सरोकार का सुंदर उदाहरण है।

कार्यक्रम का आयोजन विश्वविद्यालय के सामान्य प्रशासन अनुभाग के माध्यम से किया गया। इस अवसर पर कुलसचिव, वित्त नियंत्रक सहित संकायाध्यक्ष, विभागाध्यक्ष, शिक्षक, अधिकारी, कर्मचारी, शोधार्थी, विद्यार्थी एवं अतिथि शिक्षक उपस्थित रहे।

सामूहिक रूप से राष्ट्रगीत एवं राष्ट्रगान के गायन के साथ संविधान पार्क में आयोजित यह कार्यक्रम विश्वविद्यालय परिवार के लिए राष्ट्रीय एकता, मातृभूमि के प्रति श्रद्धा और राष्ट्रनिर्माण के संकल्प का भावपूर्ण अवसर बन गया।

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