महर्षि दयानंद के राष्ट्र चिंतन और स्वतंत्रता आंदोलन की वैचारिक पृष्ठभूमि पर राष्ट्रीय संगोष्ठी में कुलगुरु ने दयानंद के 1855–1860 के कालखंड पर शोध की आवश्यकता जताई

स्वाधीनता दिवस के सप्तदिवसीय समारोह की शृंखला में राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित — दयानंद के राष्ट्र चिंतनशिक्षाचरित्र निर्माण और स्वराज की अवधारणा पर मंथन

अजमेर। महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालयअजमेर के महर्षि दयानंद शोध पीठ के तत्वावधान में स्वाधीनता दिवस के सप्तदिवसीय समारोह की शृंखला में महर्षि दयानंद सरस्वती का राष्ट्र चिंतन और स्वतंत्रता आंदोलन की वैचारिक पृष्ठभूमि निर्माण में योगदान विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी मे कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए कुलगुरु प्रो. सुरेश कुमार अग्रवाल ने महर्षि दयानंद के चिंतन को शिक्षाचरित्र निर्माणसामाजिक सुधारआत्मनिर्भरता और स्वराज की एक समग्र वैचारिक यात्रा बताते हुए इसे वर्तमान पीढ़ी और विकसित भारत 2047 के निर्माण से जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया।  महर्षि दयानंद के राष्ट्र चिंतन को रेखांकित करते हुए कुलगुरु ने कहा कि महर्षि दयानंद सरस्वती भारतीय स्वतंत्रता के योजनाकार थे”—यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा। उन्होंने शोधकर्ता ए.के. गांधी की पुस्तक Swami Dayanand and the 1857 का उल्लेख करते हुए कहा कि महर्षि दयानंद के जीवन का 1855 से 1860 का कालखंड स्वतंत्रता आंदोलन की वैचारिक पृष्ठभूमि को समझने की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस अवधि में उनके तात्या टोपेनाना साहब और अजीमुल्ला खान जैसे स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख व्यक्तित्वों से संपर्क के उल्लेख मिलते हैं।

उन्होंने कहा कि उस समय इंटरनेटसोशल मीडिया और आधुनिक संचार माध्यम उपलब्ध नहीं थे। ऐसे समय में साधु-संत और संन्यासी सामाजिक जागरण एवं संदेश प्रसार के महत्वपूर्ण माध्यम थे। महर्षि दयानंद ने भी इस भूमिका को प्रभावी ढंग से निभाया। उन्होंने कमल और रोटी’ आंदोलन का उल्लेख करते हुए कहा कि रोटी जन-संपर्क एवं जन-नेटवर्क तथा कमल सैनिक नेटवर्क का प्रतीक था। इस प्रकार महर्षि दयानंद ने सीमित संसाधनों के बावजूद व्यापक सांस्कृतिक और राष्ट्रीय चेतना जगाने का कार्य किया। प्रो. अग्रवाल ने कहा कि महर्षि दयानंद का जीवन यह संदेश देता है कि साधनों का अभाव राष्ट्र के प्रति संकल्प और समर्पण के मार्ग में बाधा नहीं बन सकता। आवश्यकता राष्ट्र के प्रति स्पष्ट दृष्टिजनजागरण और दृढ़ संकल्प की है। उन्होंने वर्तमान समय में भी इसी प्रकार की सकारात्मक और रचनात्मक जनजागृति की आवश्यकता बताई।

उन्होंने महर्षि दयानंद के चिंतन को स्वतंत्रता प्राप्ति की एक क्रमिक वैचारिक प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत करते हुए कहा कि दयानंद के विचारों में यात्रा ज्ञान से चरित्र निर्माणचरित्र निर्माण से सामाजिक सुधारसामाजिक सुधार से सामाजिक सम्मानसामाजिक सम्मान से आत्मनिर्भरता और आत्मनिर्भरता से स्वराज की ओर जाती है। उन्होंने कहा कि दयानंद का स्वराज केवल राजनीतिक अवधारणा नहीं थाबल्कि उसमें सांस्कृतिक स्वराज और राजनीतिक स्वराजदोनों का व्यापक भाव निहित था।

प्रो. अग्रवाल ने महर्षि दयानंद शोध पीठ से आग्रह किया कि महर्षि दयानंद के 1855 से 1860 के कालखंड पर विशेष शोध कराया जाए। उन्होंने संभावित शोध विषय के रूप में दयानंद और 1857 : इतिहास के पन्नों के बीच का अन्वेषण जैसे विषयों पर शोध को प्रोत्साहित करने की बात कही। उन्होंने कहा कि इस कालखंड पर अभी और गंभीर अकादमिक कार्य किए जाने की आवश्यकता हैजिससे स्वतंत्रता आंदोलन में महर्षि दयानंद के योगदान के अनछुए पक्ष सामने आ सकें। उन्होंने बताया कि विश्वविद्यालय में महर्षि दयानंद शोध पीठ के माध्यम से इस दिशा में कार्य जारी है तथा UGC चेयर की फंडिंग समाप्त होने के बावजूद विश्वविद्यालय ने महर्षि दयानंद चेयर को जारी रखा है। उन्होंने शोध पीठ से दयानंद दर्शनराष्ट्र चिंतन और स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े नए शोध विषयों को प्राथमिकता देने का आह्वान किया।

कुलगुरु ने कहा कि व्यक्ति का विकास होगा तो समाज का विकास होगा और समाज का विकास होगा तो राष्ट्र का विकास होगा। इसी क्रमिक विकास के माध्यम से विकसित भारत 2047 के संकल्प को साकार किया जा सकता है। उन्होंने महर्षि दयानंद के विचारों को वर्तमान शिक्षा व्यवस्थायुवा चेतना और राष्ट्र निर्माण से जोड़ते हुए कहा कि विश्वविद्यालयों को ऐसे विद्यार्थियों का निर्माण करना होगा जो ज्ञानवान होने के साथ चरित्रवानआत्मनिर्भरसंस्कारित और राष्ट्र के प्रति उत्तरदायी हों।

कार्यक्रम में मुख्य अतिथि शाहपुरा विधायक एवं विश्वविद्यालय प्रबंध मंडल सदस्य डॉ. लाला राम बैरवा ने कहा कि महर्षि दयानंद सरस्वती ने अंधविश्वास और सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध वैचारिक चेतना जगाई तथा सत्यार्थ प्रकाश के माध्यम से सत्य की खोज और असत्य के त्याग की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा कि शिक्षा केवल नौकरी और आर्थिक सफलता का माध्यम नहीं होनी चाहिएबल्कि उसमें संस्कारसंस्कृतिजीवन-मूल्य तथा राष्ट्र और समाज के प्रति कर्तव्यबोध भी होना चाहिए।  मुख्य वक्ता डॉ. श्रीगोपाल बाहेती ने कहा कि महर्षि दयानंद के विचार आज भी शिक्षास्वास्थ्यरोजगार और सामाजिक जीवन के प्रश्नों का मार्गदर्शन कर सकते हैं। उन्होंने आर्य समाज के दस नियमों में निहित जीवन-दृष्टि को प्रासंगिक बताते हुए संसार का उपकार करना इस समाज का मुख्य उद्देश्य है को विशेष रूप से रेखांकित किया।  वक्ता श्री अंकित प्रभाकर द्वारा विचार अभिव्यक्त किए गए|  विषय प्रवर्तन प्रो. ऋतु माथुर ने किया तथा कुलसचिव एवं वित्त नियंत्रक सुश्री नेहा शर्मा ने आभार व्यक्त किया।

इस अवसर पर विश्वविद्यालय के शिक्षकअधिकारी-कर्मचारीशोधार्थीविद्यार्थी एवं मीडिया प्रतिनिधि उपस्थित रहे।

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